क्या कन्यादान अनुचित और अशास्त्रीय है ?
आधुनिक नारीवादियों की समस्या क्यों है क्या कन्यादान अनुचित और अशास्त्रीय है ?
आधुनिक नारीवादियों की समस्या 'कन्यादान' है । कन्यादान ही क्यों होता है ? पुत्रदान क्यों नहीं होता ? नारीवादियोंको भी कन्यादान स्त्रियों की गुलामी लगती है ।
वैसे हमें कोई आवश्यकता नहीं है ,नारीवादियोंके रोना रोने पर ,हम तो इसलिये 'कन्यादान' पर लिख रहे हैं क्योंकि कल हमने एक मित्र की वाल पर पोस्ट देखी । ज्ञात नहीं उन्होंने स्वयं लिखी थी अथवा किसी की कॉपीपेस्ट की । सम्भवतः उनका उद्देश्य नारीवादियोंके प्रलाप खण्डन करना रहा होगा । किन्तु उन्होंने खण्डन में परोक्ष रूप से उन्ही का समर्थन ही कर दिया ,सम्भवतः उन्हें यह बात ज्ञात भी न हो । अब कैसे उन्होंने नारीवादियों का समर्थन किया यह हम समझाते हैं । उन्होंने कह दिया हिन्दू शास्त्रों 'कन्यादान ' है ही नहीं ,कन्या कोई वस्तु नहीं है जो उसका दान हो , कन्या दान की वस्तु नहीं इसीलिये कन्याअदान होती है अर्थात् कन्या का दान मत करो ।'
आश्चर्य है शास्त्र विरुद्ध ये कैसी व्याख्या कर डाली । न तो उन्हें शास्त्रों का ही ज्ञान है ,न दान शब्द का और न कन्यादान का प्रयोजन ही ज्ञात है । इसीलिये तो उन्होंने कन्यादान अशास्त्रीय कहकर कन्यादान पर प्रश्नचिह्न लगा दिया । हमारे विवाह संस्कार की परम्परा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया ,परोक्ष रूप से तो नारीवादियों के मतका ही समर्थन हो गया न । अब जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े हैं , ये लोग उन्हें पढ़ेंगे वे सोचेंगे सत्य ही लिखा है ,शास्त्रों में तो है नहीं कन्यादान फिर हम क्यों करते हैं ?
कन्यादान का अर्थ और कन्यादान का प्रयोजन का शास्त्रीय प्रमाण हम प्रस्तुत करते हैं ,किसी नारीवादी को फिर कोई समस्या हो तब हमसे चर्चा करे ।
कन्यादान कहने से कन्या कोई वस्तु नहीं हो जाएगी और न ये स्त्री की कोई गुलामी ही है । पहले दान का अर्थ समझिये ,दान का अर्थ है प्रदान करना ,देना ,सौंपना इत्यादि । क्या माता-पिता अपनी कन्या वर को नहीं प्रदान करते हैं ? और करते हैं तो क्या अनुचित करते हैं ? शास्त्रों में कन्या के सात प्रकारके पुनर्विवाह वर्णित हैं ,जिनमें वाग्दान और मनोदान भी हैं -"सप्त पौनर्भवा: कन्या .... वाचादत्ता मनोदत्ता कृत कौतुकमङ्गला ।"( महर्षि काश्यपका वचन )
अब वाग्दान और मनोदान का अर्थ क्या हुआ ? वाग्दान (वाक् का दान ) अर्थात् वचन देना और मनोदान अर्थात् मन देना । क्या वचन भी कोई वस्तु है जो उसका दान होता है ? क्या मन भी कोई वस्तु है जो उसका दान होता है ? अरे भाई वाग्दान का तात्पर्य है ,अपनी पुत्रीके विवाह का वचन देना । और मनोदान का अर्थ है कन्या अपने मन से किसी को अपना पति चुनना ,उस व्यक्ति को अपना मन देना अर्थात् मन का दान करना । ऐसे ही कन्यादान का अर्थ है ,अपनी पुत्री जिसका आपने पालन-पोषण किया , उसकी सुरक्षा की ,उसकी आवश्यकताओं को पूरा किया अब वर को अपनी पुत्री देता हूँ , वर को पुत्री दान करता हूँ ,प्रदान करता हूँ । शास्त्रों में कन्या दान चार प्रकारके विवाहों में ही होता है ,ब्राह्मविवाह में -
"आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित: ।।"मनु०३/२७
दैव विवाह में -
"अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ।" मनु०३/२८ गंधर्व विवाह में -
"कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते ।" मनु०३/२९
प्रजापत्य विवाह में -
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्रजापत्यो विधि: स्मृतः ।" मनु ३/३०
उक्त👆 श्लोकों २७-२८ में मनुजी ने कन्यादान और २९-३० में स्पष्ट कन्याप्रदान लिखा है ।
आसुर ,गान्धर्व ,राक्षस और पैशाच विवाहों में कन्यादान नहीं होता है । अब पुत्र के दान पर आते हैं ,यह तो स्पष्ट है दान का अर्थ होता है दूसरे को देना या प्रदान करना । दत्तकपुत्र सुना होगा आपने ? दत्तक का अर्थ है अपने कुल से दूसरे कुल में देना अर्थात् दूसरे के कुल को पुत्र का दान करना । तो दत्तकपुत्र का अर्थ हुआ पुत्रदान । जिस कन्या का कोई भाई नहीं होता उसके पुत्र का दान भी नाना को किया जाता है अर्थात् वह अपने नाना का पुत्र होता है । इसलिये अभ्रातृका कन्या का विवाह पुत्रिका धर्म से होता है ,जिसमें कन्या का पिता कन्या के पति से कहता है ,इस कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मेरा पुत्र माना जाएगा -
"अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।
यदपत्यं भवेदस्यां तन् मम स्यात् स्वधाकरम् ।।
[ अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलङ्कृताम् ।
अस्यां यो जायते पुत्र: स मे पुत्रो भवेदिति ।।] मनु ० ९/१२७
अब यह समझते हैं कन्यादान किया क्यों जाता है -
"पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।।" मनु० ९/३
अर्थात् ' बचपन में कन्या की रक्षा पिता करता है ,यौवनावस्था में स्त्री की रक्षा पति करता है , वृद्धावस्था में स्त्री की रक्षा पुत्र करता है । स्त्री किसी भी अवस्था में अरक्षित होने के योग्य नहीं अर्थात् असहाय और बेसहारा नहीं की जाती ।'
बाल्यावस्था में पिता पुत्री का लालन-पालन करके उसकी व्यवस्था करने के लिये पति को प्रदान करता है । जहाँ पत्नीके लिये पति के नित्य-नैमित्तिक अग्निहोत्र-बलिवैश्वदेव की व्यवस्था परम दायित्व है ,तो वहीं पति का दायित्व है पत्नीके लिये जीवन पर्यन्त गृह ,भोजन ,वस्राभूषण आदि की व्यवस्था करे । उसके लिये पति चाहे जैसे भी धन की व्यवस्था करे ,चाहे किसी की नौकरी करके अथवा मजदूरी करके ही सही । स्त्रीके लिये यह आवश्यक कर्तव्य नहीं कि वह नौकरी और मजदूरी करके गृहस्थी का पालन करे ,यह दायित्व पति को दिया है शास्त्रों ने पत्नी को नहीं । स्त्री अपनी स्वेच्छा से कोई भी कर्तव्य पालन कर सकती है ,चाहे वो प्राचीन नारियों की तरह रण में युद्ध करना ही क्यों न हो ,इसके लिये स्त्रीकी स्वेच्छा अपेक्षित है पर उसके लिये किसी भी तरह की बाध्यता नहीं है । जबकि पुरुषों के लिये तो यह बाध्यता है कि वह गृहस्थी के पालन के लिये वृत्ति की व्यवस्था करे ,यह उसकी बाध्यता है ,पति की स्वेच्छा अपेक्षित नहीं है । इसी कारण कन्या पति को प्रदान की जाती है । आधुनिक नारी यदि स्वयं को सशक्त मानकर यह कहती हैं कि उन्हें पतिके रक्षण की आवश्यकता नहीं है ,वे कन्यादान क्यों करें ,पति का ही दान क्यों न लें ,तो इसमें भी उनकी स्वेच्छा अपेक्षित है। आजके इस धन लोलुप समाज में ऐसे लोग भी अधिक हैं जो उन लड़कियों से जिनका कोई भाई नहीं है ,उनसे विवाह करने के लिये स्वयं को विशेष सौभाग्यशाली समझते हैं ,जबकि अभ्रातृका कन्या से प्राचीन आर्ष ऋषि विवाह करने से डरते थे क्योंकि उन्हें दूसरे कुल में जाना पड़ेगा ,दूसरे कुल का पिंड देना पड़ेगा ।
आर्ष संस्कृति 'कन्यादान' की विशिष्टता यह है कि यहाँ कन्या का दान (कन्या की जिम्मेदारी ) लेने वाला दरिद्र से दरिद्र पति स्वयं पुराने वस्त्रों-जूते-चप्पल में रहकर भी अपनी पत्नी को स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत करता है , चाहे वह उसकी स्थितिके अनुसार स्वर्ण आभूषण कर्ण फूल और मङ्गलसूत्र ही क्यों न हों । वह स्वयं के लिये ऐसी कोई अपेक्षा नहीं रखता ,उसकी सारी कामनाएँ पत्नी और सन्तानोंको खुशियाँ और संसाधन उपलब्ध करना अपेक्षित होता है । क्या आधुनिक नारी जो कहती हैं ,कन्यादान क्यों करें पतिदान क्यों नहीं होता । वे नारियाँ क्या ऐसे पति की जिम्मेदारी ले सकती हैं ? जिसमें स्वयं के लिये कोई विशिष्ट साधन उपलब्ध कराना अपेक्षित न हो ? क्या ऐसी कोई आधुनिक नारीवादी स्त्री देखी है ,जो स्वयं पुराने-जीर्ण वस्त्रों में बिना आभूषण पहने हो उसके पति को उसने स्वर्ण की चैन और अंगूठियों से अलंकृत किया हो ?
स्मरण रहे हमारी वैदिक हिन्दू संस्कृति ने स्त्रियों को हर क्षेत्र में काम करने का अधिकार तो दिया पर उनके लिये किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं है ,उसमें उनकी स्वेच्छा ही अपेक्षित है


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