सुखी परम वैभवशाली व्यवस्था का निर्माण अन्याय अधर्म और शोषणकारी व्यवस्था से मुक्ति
गोकुल गुरुकुल के माध्यम से संपूर्ण शांति आनंद खुशी सहित मानवीय मूल्य व चरित्र निर्माण समाज व राष्ट्र का निर्माण
क्या आप जानतें हैं कि World Bank विश्व बैंक के मालिक सिर्फ़ 13 परिवार हैं ? जी हां विश्व बैंक सरकारी बैंक नहीं है, इसमें दुनियां के महज 13 सबसे अमीर परिवारों का पैसा लगा हुआ है। इसका एक मुख्यालय अमेरिका के वाशिंगटन डीसी में और दूसरा मुख्यालय जर्मनी में है। इनके पास इतना पैसा है कि यह बैंक दुनियां के हर देश की सरकारों को कर्ज देता है। संयुक्त राष्ट्र संघ कहनें को तो दुनियां से सभी देशों की सांझी पंचायत है, पर हकीकत में UNO एक ऐसा संगठन है जो विश्व बैंक परिवार द्वारा संचालित और वित्त पोषित है। विश्व बैंक के मालिक इन 13 संघीय बैंकरों/मालिकों का सिक्का सीधे संयुक्त राज्य अमेरिका पर चलता है। इसे संचालित करनें वाले कुल 13 परिवार हैं, जिन्हें एलुमनी कहा जाता है जो 1776-77 में बनाए गए थे। विश्व बैंक के मालिक सभी 13 मुख्य घरानें जर्मनी और संयुक्त राज्य अमेरिका से हैं और उनकी कुल संपत्ति 6000 करोड़ ट्रिलियन बताई जाती है, जो दुनिया की कुल संपत्ति का लगभग 70% है। लोकतंत्र के नाम पर किसी भी देश के प्रधानमंत्री की नियुक्ति उन्हीं 13 परिवारों द्वारा की जाती है जो इन परिवारों के हितों को ध्यान में रखकर ही अपना देश चलाते हैं! इंग्लैंड में आज भी महारानी का राज चलता है विश्व बैंक ऋण देनें के बदले में देशों के साथ समझौता करता है कि पहले हमारी ये शर्त मानों हम फिर तुम्हें पैसा देगें, मतलब दुनियां की सरकारों को पैसा ये अपनी शर्तों पे देता है। विश्व बैंक के में 13 परिवारों की इसी नीति के अनुसार ही भारत (फेडरेशन डायरेक्ट ट्रेड एसोसिएशन) का मनमोहन सिंह सरकार के साथ समझौता हुआ था। विश्व में लोकतंत्र के नाम पर इन्हीं का ही सिक्का चलता है यह अनेक माध्यम वे फंड कराती है जैसे केजरीवाल को कई विदेशी संस्थाओं से फंड मिला था भारत में मुख्यधारा की अनेक अनेक पार्टियों की सरकारें इन 13 पूंजीपतियों की आंतरिक गुलाम हैं। जरा सोचो 1947 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन हुआ तो नदियों को बांटने में विश्व बैंक क्यों शामिल था ? क्योंकि विश्व बैंक की स्थापना 1944 में संयुक्त राज्य अमेरिका में तब हुई थी जब द्वितीय विश्व युद्ध में दो पूंजीपतियों के बीच युद्ध चरम सीमा पर था, इस युद्ध में पूरी इंसानियत पिस गई थी।
विश्व बैंक इतना शक्तिशाली है कि वह दुनियां के किसी भी देश को कभी भी युद्ध में झोंक सकता है। अब सबसे चिंताजनक बात यह है कि विश्व बैंक के मालिक इन 13 निजी परिवारों की नजर अब पंजाब, हरियाणा, यूपी सहित देश के ज़रखेज़ खेती वाले मैदानी इलाकों की उपजाऊ जमीन के साथ ही पाकिस्तान की जमीन पर भी है! यह बात एजेंसियां भी समझती हैं, लेकिन कोई रास्ता बचा नहीं है, क्योंकि कागजों पर हमारे गावों की जमीनें हमारे देश के बैंकों के पास गिरवी हैं और दिलचस्प बात ये है कि हमारे बड़े बैंक और हमारा देश भी इन 13 परिवारों के विश्व बैंक के पास गिरवी रखा हुआ है।
3 संपूर्ण विश्व में अनेकों कानून आज भी आजादी की बाद भी इसी कड़ी का हिस्सा थे ! बेशक देश को आजाद हुए काफी समय हो गया है लेकिन आज भी देश को ये 13 परिवार ही चलाते है
मूल निवासियों के अधिकारों संबंधी संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा पत्र के उपरांत भारत के विरुद्ध सक्रिय शक्तियों ने भारत में अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ही मूलनिवासी प्रमाणित करने का अभियान छेड़ कर शेष सब हिंदुओं के विरुद्ध व्यापक अभियान छेड़ दिया है। इसके लिए नितांत अप्रामाणिक ,अनैतिहासिक, कूट रचित ,जालसाजी और फरेब से भरपूर दस्तावेज तैयार किए जा रहे हैं और अनेक संस्थाएं इसके लिए सक्रिय हैं। आपको यह यदि नहीं पता है तो आप सचमुच किसी पीड़ित समूह की वास्तविक शिकायत मानकर निश्चिंत बैठे रहेंगे । ऊपर से पहले कांग्रेस शासन और फिर अब मोदी शासन ने अनुसूचित जातियों को झूठी शिकायतें करने का विशेष अधिकार इस रूप में दे दिया है कि शिकायत होते ही आरोपी को हवालात में बंद कर दिया जाएगा और जेल भी भेजा जा सकता है। जिससे यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहज ही अभिलेखीय प्रमाण सुलभ हो जाएगा कि वास्तव में भारत में व्यापक हिंदू समाज ने अनुसूचित जातियों के साथ भीषण अन्याय किया ।ऐसा अन्याय किया जो विश्व में यूरोपीय लोगों ने कभी भी नहीं किया ।। इस प्रकार का महा झूठ प्रचारित हो जाएगा और मोदी सरकार तथा विविध हिंदू संगठन इसे हिंदुओं की जाति व्यवस्था या अन्य किसी परंपरा और व्यवस्था के सर पर आरोप मढते रहेंगे । आरोप की और कोई कीमत नहीं है सिवाय इसके कि अपने को दलित कहने वाले समूहों का स्वयं को मूलनिवासी बताकर शेष हिंदू समाज को बाहरी बताने का अभियान जारी रहेगा और तथाकथित हिंदू संगठन वस्तुतः इन झूठे मूल निवासियों के सच्चे मित्र सिद्ध हो जाएंगे और इस प्रकार शायद व्यक्तिगत रूप से संगठनों के सदस्य इन लोगों की कृपा से बाद में कुछ अधिकार पा जाएं परंतु हिंदू समाज का तो यह विनाश ही कर डालेंगे ।। ऊपर से यह प्रचार जोरों से है कि जाति की बात मत करो ,केवल हिंदुत्व की बात करो। जिससे और भी अभिलेखीय साक्ष्य हो जाएगा कि जाति कोई बड़ी भयंकर चीज है जो हिंदू समाज में जाने कब से मूल निवासियों का शोषण करने के काम आती रही है। ऐसी मूर्खतापूर्ण और तामसिक सोच और जाति घातक, देश घातक तथा राष्ट्र घातक विचार कार्य रूप में करते हुए यानी फैलाते हुए हिंदू समाज की जड़ों पर चोट करने वाले समूह स्वयं को हिंदू संगठन कहते लजाते भी नहीं। और अनेक उच्च कहीं जाने वाली जातियों के सदस्य अपनी मूर्खता बस इन हिंदू संगठनों के इन हिंदू घाती प्रचार का और हिंदू घातक प्रावधान का पक्ष लेते रहते हैं । रोने के लिए तो कहा जा सकता है कि लगता है हिंदुओं के विनाश के दिन आ गए और उस विनाश में बहुत बड़ी भूमिका जाति की दिन-रात निन्दा करने वाले हिंदू संगठन और उनके सदस्य ही निभाएंगे ।। परंतु रोना तो कायरों का काम है और नपुंसक लोगों का काम है । आप यदि नपुंसक और कायर नहीं है तो अपने स्तर पर सजग होकर सक्रिय हो जाइए ।। जाति के विरोधी को यदि दो थप्पड़ या दो जूते नहीं लगा सकते तो उससे हाथ जोड़कर कहिए कि हम आपसे बातचीत नहीं करना चाहते ।। और जाति का आत्म गौरव स्थापित कीजिए जो कि समाज और राष्ट्र के आत्मगौरव का अभिन्न अंग है ।सहज अवयव है । और दलित वाद की विदेशी जड़ों को ,भारत द्रोह को पहचान कर सजग होइए। और संयुक्त राष्ट्र के मूल निवासी अधिकार घोषणा पत्र का लाभ उठाने की उनकी तत्परता को पहचानिए और तब इस दिशा में अनेक ऐसे कार्य सहज ही हो सकते हैं और वह इस मूलनिवासी अधिकार घोषणा पत्र के आधार पर भी हो सकते हैं ,वह हमारे पक्ष में जा सकते हैं ,अगर आपकी बुद्धि सजग और सक्रिय हो ।। उसके लिए सर्वप्रथम तो यह आवश्यक है कि आत्म गौरव का भाव रखिए ।। अपनी अपनी जाति पर गौरव रखिए और समाज के विरुद्ध अपनी जाति के भीतर एक भी शब्द कहने की किसी को अनुमति नहीं दीजिए। जो जो हिंदू समाज की निंदा करता है ,वह किसी भी जाति का व्यक्ति नहीं है। वह कुल द्रोही,जाति द्रोही ,समाज द्रोही और इसलिए राष्ट्र द्रोही है ।। अपनी जाति या किसी भी जाति की कभी भी निंदा नहीं कीजिए । दुष्टों को मार भगाइये या उनसे दूर रहिए।। जातिव्यवस्था हिंदू समाज का सहज अंग है और सहज इकाई है ।।वह किसी भी अन्याय का माध्यम नहीं है। परंतु किसी भी माध्यम से अन्याय करने वाला अन्याय कर सकता है ।। अतः अन्याय का समर्थन किसी भी स्तर पर नहीं कीजिए और अन्याय दूर करने के नाम पर जिस संस्था और परंपरा को अन्याय रहित बनाना है ,उसे ही नष्ट करने का जड़ बुद्धि वाला काम मत करिए।। अपने समाज को शक्तिशाली बनाने के लिए आप मूल निवासी अधिकार घोषणापत्र का अपने पक्ष में उपयोग कर सकते हैं ।। यह बहुत सरल है।। परंतु सर्वप्रथम अपना आहार विहार अर्थात अपना अपना सात्विक और श्रेष्ठ भोजन भजन और दिनचर्या को सुरक्षित रखें तथा अपनी मान्यताओं पर टिके रहिए। उन पर गौरव रखिए।। सभी द्विज यज्ञोपवीत संस्कार अवश्य करें ।। वेद पाठ करना सबके वश का नहीं है। परंतु वेद पाठ कराएं और सुनें। स्वयं करने के चक्कर में न पड़ें ।। इसके साथ ही शास्त्रों को पढ़ें और काव्य पढ़ें । उनकी प्रतिष्ठा करें। पूजा तिलक चंदन आदि सभी कर्मकांड अनिवार्य रूप से करें ।। जितना हो सकता है उतना करें । संस्कृत अवश्य सीखें और उसका अधिक से अधिक प्रचार करें और संस्कृत पर गर्व करें ।। क्योंकि मूलनिवासी अधिकार घोषणा पत्र के अनुसार यह सब मूलनिवासी होने की अनिवार्य निशानियां है, लक्षण है ,पहचान है ,गुण है।। यही आप का आधार है। इसे कायम रखें ।। पापी राजनीतिज्ञों ने इन चिन्हों को तोड़ने का अभियान चलाया । जनेऊ तोड़ने का अभियान चलाने वाले राजनेता समाज के प्रति अनजाने ही अपराधी हैं । उनके प्रति उदार क्षमा भाव रखिए ।परंतु उनको कोई महान व्यक्ति मत मानिए ।। इस विषय में वे मूर्ख थे। उनके अनुसरण में आप ने कभी जनेऊ त्याग दिया हो तो पुनः धारण कीजिए। आवश्यक संस्कार संपन्न करके धारण कीजिए ।। तिलक आदि लगाना आरंभ कीजिए। और उत्सवों और अवसरों पर अपने परिधान अवश्य पहनिए। अपनी नीतियों और कर्म कांडों को सुरक्षित रखें और आप में से जो अधिक मेधावी और विद्वान या बुद्धिमान हैं ,वह संसार के विषय में और अधिक जाने तथा जानकर अपनी निजी संस्था या निजी दुकान न चलाएं बल्कि समाज को उन सब की जानकारी दें। समाज को जानकारी देते हुए और समाज के हित में काम करते हुए अगर अपनी दुकान भी चला रहे हैं, अपना कोई संगठन आदि चला रहे हैं तो उसमें भी कुछ भी अनुचित नहीं।। लेकिन कोई भी संगठन हिंदू संगठन या ब्राह्मण संगठन या किसी भी नाम से यदि भारत की आधारभूत इकाई यों को यानी कुल समूह ,जाति, खाप,संप्रदाय ,मेडी, आदि की निंदा करे तो उसे रोकिए।। अपने अपने क्षेत्र में भागवत महापुराण आदि सुननाचाहिए। स्थानीय स्तर पर प्रचलित शास्त्रों और काव्यों को सुनना, श्रद्धा पूर्वक उनके सुनने का आयोजन करना, दान दक्षिणा और भंडारा ,अन्न सत्र आदि का आयोजन करना :- यह सब जारी रखेंगे तो आप का मूल निवासी होना सहज सिद्ध होगा और दुष्ट दलित वादी आपको नष्ट करने की पापपूर्ण योजना में तथाकथित हिंदू संगठनों की मदद से भी सफल नहीं हो पाएंगे ।हरि: ॐ तत्सत। 🙏🙏 आदरणीय प्रो रामेश्वर मिश्र पंकज जी के पटल से
क्या कन्यादान अनुचित और अशास्त्रीय है ? आधुनिक नारीवादियों की समस्या क्यों है क्या कन्यादान अनुचित और अशास्त्रीय है ? आधुनिक नारीवादियों की समस्या 'कन्यादान' है । कन्यादान ही क्यों होता है ? पुत्रदान क्यों नहीं होता ? नारीवादियोंको भी कन्यादान स्त्रियों की गुलामी लगती है । वैसे हमें कोई आवश्यकता नहीं है ,नारीवादियोंके रोना रोने पर ,हम तो इसलिये 'कन्यादान' पर लिख रहे हैं क्योंकि कल हमने एक मित्र की वाल पर पोस्ट देखी । ज्ञात नहीं उन्होंने स्वयं लिखी थी अथवा किसी की कॉपीपेस्ट की । सम्भवतः उनका उद्देश्य नारीवादियोंके प्रलाप खण्डन करना रहा होगा । किन्तु उन्होंने खण्डन में परोक्ष रूप से उन्ही का समर्थन ही कर दिया ,सम्भवतः उन्हें यह बात ज्ञात भी न हो । अब कैसे उन्होंने नारीवादियों का समर्थन किया यह हम समझाते हैं । उन्होंने कह दिया हिन्दू शास्त्रों 'कन्यादान ' है ही नहीं ,कन्या कोई वस्तु नहीं है जो उसका दान हो , कन्या दान की वस्तु नहीं इसीलिये कन्याअदान होती है अर्थात् कन्या का दान मत करो ।' आश्चर्य है शास्त्र विरुद्ध ये कैसी व्याख्या कर डाली । न तो उन्हें शास्त्रों का ही ज्ञान है ,न दान शब्द का और न कन्यादान का प्रयोजन ही ज्ञात है । इसीलिये तो उन्होंने कन्यादान अशास्त्रीय कहकर कन्यादान पर प्रश्नचिह्न लगा दिया । हमारे विवाह संस्कार की परम्परा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया ,परोक्ष रूप से तो नारीवादियों के मतका ही समर्थन हो गया न । अब जिन्होंने शास्त्र नहीं पढ़े हैं , ये लोग उन्हें पढ़ेंगे वे सोचेंगे सत्य ही लिखा है ,शास्त्रों में तो है नहीं कन्यादान फिर हम क्यों करते हैं ? कन्यादान का अर्थ और कन्यादान का प्रयोजन का शास्त्रीय प्रमाण हम प्रस्तुत करते हैं ,किसी नारीवादी को फिर कोई समस्या हो तब हमसे चर्चा करे । कन्यादान कहने से कन्या कोई वस्तु नहीं हो जाएगी और न ये स्त्री की कोई गुलामी ही है । पहले दान का अर्थ समझिये ,दान का अर्थ है प्रदान करना ,देना ,सौंपना इत्यादि । क्या माता-पिता अपनी कन्या वर को नहीं प्रदान करते हैं ? और करते हैं तो क्या अनुचित करते हैं ? शास्त्रों में कन्या के सात प्रकारके पुनर्विवाह वर्णित हैं ,जिनमें वाग्दान और मनोदान भी हैं -"सप्त पौनर्भवा: कन्या .... वाचादत्ता मनोदत्ता कृत कौतुकमङ्गला ।"( महर्षि काश्यपका वचन ) अब वाग्दान और मनोदान का अर्थ क्या हुआ ? वाग्दान (वाक् का दान ) अर्थात् वचन देना और मनोदान अर्थात् मन देना । क्या वचन भी कोई वस्तु है जो उसका दान होता है ? क्या मन भी कोई वस्तु है जो उसका दान होता है ? अरे भाई वाग्दान का तात्पर्य है ,अपनी पुत्रीके विवाह का वचन देना । और मनोदान का अर्थ है कन्या अपने मन से किसी को अपना पति चुनना ,उस व्यक्ति को अपना मन देना अर्थात् मन का दान करना । ऐसे ही कन्यादान का अर्थ है ,अपनी पुत्री जिसका आपने पालन-पोषण किया , उसकी सुरक्षा की ,उसकी आवश्यकताओं को पूरा किया अब वर को अपनी पुत्री देता हूँ , वर को पुत्री दान करता हूँ ,प्रदान करता हूँ । शास्त्रों में कन्या दान चार प्रकारके विवाहों में ही होता है ,ब्राह्मविवाह में - "आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्म: प्रकीर्तित: ।।"मनु०३/२७ दैव विवाह में - "अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ।" मनु०३/२८ गंधर्व विवाह में - "कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते ।" मनु०३/२९ प्रजापत्य विवाह में - कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्रजापत्यो विधि: स्मृतः ।" मनु ३/३० उक्त👆 श्लोकों २७-२८ में मनुजी ने कन्यादान और २९-३० में स्पष्ट कन्याप्रदान लिखा है । आसुर ,गान्धर्व ,राक्षस और पैशाच विवाहों में कन्यादान नहीं होता है । अब पुत्र के दान पर आते हैं ,यह तो स्पष्ट है दान का अर्थ होता है दूसरे को देना या प्रदान करना । दत्तकपुत्र सुना होगा आपने ? दत्तक का अर्थ है अपने कुल से दूसरे कुल में देना अर्थात् दूसरे के कुल को पुत्र का दान करना । तो दत्तकपुत्र का अर्थ हुआ पुत्रदान । जिस कन्या का कोई भाई नहीं होता उसके पुत्र का दान भी नाना को किया जाता है अर्थात् वह अपने नाना का पुत्र होता है । इसलिये अभ्रातृका कन्या का विवाह पुत्रिका धर्म से होता है ,जिसमें कन्या का पिता कन्या के पति से कहता है ,इस कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा वह मेरा पुत्र माना जाएगा - "अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् । यदपत्यं भवेदस्यां तन् मम स्यात् स्वधाकरम् ।। [ अभ्रातृकां प्रदास्यामि तुभ्यं कन्यामलङ्कृताम् । अस्यां यो जायते पुत्र: स मे पुत्रो भवेदिति ।।] मनु ० ९/१२७ अब यह समझते हैं कन्यादान किया क्यों जाता है - "पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने । रक्षन्ति स्थविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ।।" मनु० ९/३ अर्थात् ' बचपन में कन्या की रक्षा पिता करता है ,यौवनावस्था में स्त्री की रक्षा पति करता है , वृद्धावस्था में स्त्री की रक्षा पुत्र करता है । स्त्री किसी भी अवस्था में अरक्षित होने के योग्य नहीं अर्थात् असहाय और बेसहारा नहीं की जाती ।' बाल्यावस्था में पिता पुत्री का लालन-पालन करके उसकी व्यवस्था करने के लिये पति को प्रदान करता है । जहाँ पत्नीके लिये पति के नित्य-नैमित्तिक अग्निहोत्र-बलिवैश्वदेव की व्यवस्था परम दायित्व है ,तो वहीं पति का दायित्व है पत्नीके लिये जीवन पर्यन्त गृह ,भोजन ,वस्राभूषण आदि की व्यवस्था करे । उसके लिये पति चाहे जैसे भी धन की व्यवस्था करे ,चाहे किसी की नौकरी करके अथवा मजदूरी करके ही सही । स्त्रीके लिये यह आवश्यक कर्तव्य नहीं कि वह नौकरी और मजदूरी करके गृहस्थी का पालन करे ,यह दायित्व पति को दिया है शास्त्रों ने पत्नी को नहीं । स्त्री अपनी स्वेच्छा से कोई भी कर्तव्य पालन कर सकती है ,चाहे वो प्राचीन नारियों की तरह रण में युद्ध करना ही क्यों न हो ,इसके लिये स्त्रीकी स्वेच्छा अपेक्षित है पर उसके लिये किसी भी तरह की बाध्यता नहीं है । जबकि पुरुषों के लिये तो यह बाध्यता है कि वह गृहस्थी के पालन के लिये वृत्ति की व्यवस्था करे ,यह उसकी बाध्यता है ,पति की स्वेच्छा अपेक्षित नहीं है । इसी कारण कन्या पति को प्रदान की जाती है । आधुनिक नारी यदि स्वयं को सशक्त मानकर यह कहती हैं कि उन्हें पतिके रक्षण की आवश्यकता नहीं है ,वे कन्यादान क्यों करें ,पति का ही दान क्यों न लें ,तो इसमें भी उनकी स्वेच्छा अपेक्षित है। आजके इस धन लोलुप समाज में ऐसे लोग भी अधिक हैं जो उन लड़कियों से जिनका कोई भाई नहीं है ,उनसे विवाह करने के लिये स्वयं को विशेष सौभाग्यशाली समझते हैं ,जबकि अभ्रातृका कन्या से प्राचीन आर्ष ऋषि विवाह करने से डरते थे क्योंकि उन्हें दूसरे कुल में जाना पड़ेगा ,दूसरे कुल का पिंड देना पड़ेगा । आर्ष संस्कृति 'कन्यादान' की विशिष्टता यह है कि यहाँ कन्या का दान (कन्या की जिम्मेदारी ) लेने वाला दरिद्र से दरिद्र पति स्वयं पुराने वस्त्रों-जूते-चप्पल में रहकर भी अपनी पत्नी को स्वर्ण आभूषणों से अलंकृत करता है , चाहे वह उसकी स्थितिके अनुसार स्वर्ण आभूषण कर्ण फूल और मङ्गलसूत्र ही क्यों न हों । वह स्वयं के लिये ऐसी कोई अपेक्षा नहीं रखता ,उसकी सारी कामनाएँ पत्नी और सन्तानोंको खुशियाँ और संसाधन उपलब्ध करना अपेक्षित होता है । क्या आधुनिक नारी जो कहती हैं ,कन्यादान क्यों करें पतिदान क्यों नहीं होता । वे नारियाँ क्या ऐसे पति की जिम्मेदारी ले सकती हैं ? जिसमें स्वयं के लिये कोई विशिष्ट साधन उपलब्ध कराना अपेक्षित न हो ? क्या ऐसी कोई आधुनिक नारीवादी स्त्री देखी है ,जो स्वयं पुराने-जीर्ण वस्त्रों में बिना आभूषण पहने हो उसके पति को उसने स्वर्ण की चैन और अंगूठियों से अलंकृत किया हो ? स्मरण रहे हमारी वैदिक हिन्दू संस्कृति ने स्त्रियों को हर क्षेत्र में काम करने का अधिकार तो दिया पर उनके लिये किसी भी प्रकार की बाध्यता नहीं है ,उसमें उनकी स्वेच्छा ही अपेक्षित है
भारत की स्थिति बहुत गम्भीर बना दी इन असुरों ने। बहुत से निर्दोष लोग असमय मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। कारण बताया जा रहा है ऑक्सिजन की कमी, फेफड़े ख़राब हो रहे हैं लोग मर रहे हैं। हम साँस लेते हैं तो हवा सब से पहले फेफड़ों में जाती है, ये फेफड़े ऐसी चीज है जिस की बीमारी का पता आसानी से नहीं लगता, इनके बगल में दिल भी होता है, इनको कवर किए होती हैं हमारी पसलिया, ये पसली एक पिंजरा सा बनाती है, ये पसलियाँ जुड़ी होती है रीढ़ की हड्डी से। वैसे तो ये पसलियाँ फेफड़ों और ह्रदय की रक्षा करते हैं। मगर फेफड़ों और हृदय में गति होती है, फैलते हैं सिकुड़ते हैं, पसलियों से टकराते भी होंगे, इसलिए यहाँ कफ का होना ज़रूरी है। ये कफ ग्रीस का काम करती है। हमारा शरीर हर समय बलगम बनाता रहता है, ये ज़रूरी भी है 1-2 किलो बलगम शरीर में हमेशा होना चाहिए। ये बलगम ही धूल, मिट्टी और बैक्ट्रियां को शरीर में घुलने से रोकता है। ये सब बलगम से चिपक जाते हैं। ये बलगम फेफड़ों के आसपास कहीं बनता है। ये बलगम उतना ही ज़रूरी है जितना शरीर में ख़ून। कभी ये रात को सोते समय ये गले में आ जाता है, सुबह लोग परेशान, गर्म पानी पियो निबु पानी पियो, अदरक वाली चाय पियो, बलगम को थूक दो आदि आदि। जैसे बलगम ही झोरोना हो। आज कल लोग “भोविड़ इन्फ़ेक्शन फेफड़े” की वजह से मर रहे हैं।
जीवन की मूलभूत यथार्थ मृत्यु थी है झोरोना काल में लोग इस बलगम या कफ को अपना दुश्मन समझने लगे, लगे कफ सिरप, काढ़ा बना बना कर पीने, पता नहीं क्या क्या गर्म मसाले मिला कर इम्यूनिटी के नाम पर सुबह शाम पिये जा रहे हैं। हुआ ये की शरीर में पर्याप्त मात्रा से कम बलगम रहने लगा। हमारे शरीर को जितनी चिकनाहट मिलनी चाहिए वो नहीं मिली, या कह लो नमी की कमी के कारण सूखने लगे। इसपर मास्क लगाना। (ये सब मेरा सामान्य ज्ञान है मैं ग़लत भी हो सकता हूँ) ये सब देखते हुए मैंने दिसम्बर लिखा था :- “हृदय को मन कहते हैं और फेफड़ों को बल कहते हैं, इन्हीं दोनों शब्दों से मिलकर मनोबल बना है” “ना वैक्सिन ना कोई दवा ना दुआ” मनोबल मजबूत करो इम्यून मजबूत होगा। पता था फेफड़ों को नुक़सान होगा, बग़ल में हृदय, फेफड़े कमज़ोर, हृदय निराश हताश रहेगा भय में रहेगा, इसलिए मैंने दिसम्बर २०२० लिख दिया “मनोबल मज़बूत करो” शारीरिक भी मानसिक भी। कल पता चला की केंद्र सरकार ने भी दिसम्बर २०२० को दिल्ली सरकार को 8 ऑक्सिजन प्लांट लगाने के पैसे दिए, जिस में से केवल एक प्लांट लगा। एक छोटा सा विचार एक बीज जैसा होता है, उसको आपने अपने हृदय में रोप दिया उस विचार का वृक्ष बनना तय है। वो वृक्ष किस का होगा, ये आपके विचार पर निर्भर करता है। जो बोया वो पाया। खर पतवार उखाड़ फेंको। मैंतो शुरू से कह रहा था “वो रेंचो तुम्हारे दिमाग से खेल रहा है” । जिसकी रिपोर्ट +ve आएगी वह क्या करेगा?
टीवी ने जो डर फैला दिया है उसे देखते हुए मरीज़ हाथ पर मिनट-मिनट में सैनेटाइजर प्रयोग करेगा, दिन-रात मास्क लगाकर रखेगा, बार-बार एक साइको की तरह ऑक्सीजन लेवल चैक करेगा, उसके परिवार वाले भी यही करेंगे। मास्क लगातार लगाए रखने से 99% आपका ऑक्सीजन लेवल गिरना तय है। ऑक्सीजन लेवल गिरते ही हॉस्पिटल भागेगा। वहां अफरा-तफरी देख और दबाव मान जाएगा, इससे ऑक्सीजन लेवल और गिरेगा। फिर सोचेगा कैसे भी ऑक्सीजन सलेंडर मिल जाए। मंहगा ऑक्सीजन सलेंडर लगवा लेगा। उसका लेटे-लेटे बस ध्यान इस और रहेगा कहीं तु मरने वाला तो नहीं, कहीं तु मर तो ना जाए, तेरे बाद तेरे परिवार का क्या होगा। यह सोचते-सोचते और दबाव मान जाएगा। फिर डॉ० उसे वेंटिलेटर पर रख देंगे। अब भी लगातार उसके दिमाग में आड़-कबाड़ चल रहा होता है। वेंटिलेटर से जबरदस्ती सांस दिया जाता है तो उसकी सांस कार्यप्रणाली धीरे-धीरे कम काम करने लगती है बंद हो रही मशिनरी को जंग लगने लगता है और फेल होने सी कागार पर पहुंच जाती है। इस स्थिति में उसे कुछ भी कहा जाए वही उपयोग करने को तैयार होता है। डॉक्टर मरीज़ के परिज़न को Remdesivir जैसे useless injection मंगवाते है और भी विभिन्न प्रकार के injection ठोक दिए जाते है। हालात गंभीर हो जाती है और परलोक की तैयारी हो जाती है।ां #समाधान:- भारत में अधिकत्तर आबादी को पता ही नी उन्हें कथित कोरोना है कि नहीं। क्या आपने ऐसा केस सुना है जिसको मौत होने के बाद पोस्टमार्टम में पता चला हो इसकी मौत का कारण कोरोना था। ऐसा कोई केस नहीं मिलने का। कोरोना होने का मुख्य कारण है कोरोना टेस्ट करवाना। जबतक आपको पता नहीं है आप +ve है या -ve तब तक आप स्वस्थ रहेंगे ऐसे बहुत लोग होंगे जिन्हें कथित कोरोना होकर जा लिया लेकिन उन्हें पता भी नी चला।
यदि आप टेस्ट करवाएं +ve रिपोर्ट आई और आप वहमी परिवार से है तो आप वही करेंगे जो सबसे ऊपर लिखा है। यदि आप ऐसे परिवार से है जहां टोंट मार कर boost up किया जाता है जैसे कोई जोर से खांस रहा हो, " मरेगा कै आराम तै खांस ले नै", किसी को तेज़ बुखार होगया, "रै मरैगा तु तो, न्यू करिए आज नी कल नै मर लिए, आज थोड़ा काम है हामनै, कल ना रो लेंगे तन्नै।" "अच्छा न्यू तो बता लकड़ी कौनसी तैयार करां जै तु मरग्या/मरगी।"
मतलब हंसी-मज़ाक में उसे boost up करेंगे। लेकिन यदि ज्यादा इमोश्नल होकर दिल को बार-बार भरेंगे। बोलेंगे तेरे बिना हमारा क्या होगा हमारा, हम किसके सहारे जिएगें etc तो मरीज़ बहुत टुट जाता है उसके दिमाग में स्वस्थ होने से ज्यादा वह इमोश्नल बातें चलती रहती है।
पहले तो यही करना है कोरोना का टेस्ट नहीं करवाना क्योंकि लगभग पॉजिटिव आना तय है। Positive आ गए तो सबसे पहले मास्क का प्रयोग ना करें वरना ऑक्सीजन लेवल 99% गिरेगा ही। घर पर रहे हॉस्पिटल जाकर धक्के ना खाए। Santizar में alcohol है वह सिर में चढ़ती है। जिसने दारु नी पी कभी उसको तो नॉर्मल दारु सुंघने पर भी बहुत महसूस होती है और Santizar में alcohol की मात्रा आम दारु से ज्यादा है यह तो सिर में चढ़ता ही है। इसका प्रयोग ना करके बस साबून से ही हाथ धो ले।
जो मन को सबसे अच्छा लगे वह खाएं। चाहे वह कुछ भी हो बर्गर, पिज्जा, समोसा। जो मर्जी जो आपको सबसे ज्यादा पंसद हो। यही आपको स्वस्थ करेंगे। लोग बेसक कहें ये जंक फुड नुकसान दायक है लेकिन जब आप बिमार हो तो जो मन को सबसे ज्यादा पंसद है वह खाने से व्यक्ति 80% जल्दी स्वस्थ होता है। हां ठीक हो जाने पर जरुर इनको कुछ महीने के लिए बिलकुल त्याग दे।
भारत में ईस्वी संवत् का प्रचलन अंग्रेजी शासको
ने 1752 में किया । 1752 से पहले ईस्वी सन् 25 मार्च से शुरू होता था
किन्तु 18 वीं शताब्दी से इसकी शुरूआत एक जनवरी से होने लगी । जनवरी से जून
रोमन के नामकरण रोमन जोनस,मार्स व मया इत्यादि के नाम पर हैं । जुलाई और
अगस्त रोम के सम्राट जूलियस सीजर तथा उसके पौत्र आगस्टन के नाम पर तथा
सितम्बर से दिसम्बर तक रोमन संवत् के मासो के आधार पर रखे गये हैं ।आखिर
क्या आधार है इस काल गणना का ? यह तो ग्रहो और नक्षत्रो की स्थिति पर
आधारित होनी चाहिए । स्वतंत्रता प्राप्ती के पश्चात नवम्बर 1952 में
वैज्ञानिको और औद्योगिक परिषद के द्वारा पंचांग सुधार समिति की स्थापना की
गयी ।समिति के 1955 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार
करने की सिफारिश की । किन्तु, तत्कालिन प्रधानमंत्री पं. नेहरू के आग्रह पर
ग्रेगेरियन केलेण्ड़र को ही राष्ट्रीय केलेण्ड़र के रूप में स्वीकार लिया
गया। ग्रेगेरियन केलेण्ड़र की काल गणना मात्र दो हजार वर्षो की अति अल्प
समय को दर्शाती है ।जबकि यूनान की काल गणना 1582 वर्ष, रोम की 2757 वर्ष,
यहूदी 5768, मिस्त्र की 28691, पारसी 198875 तथा चीन की 96002305 वर्ष
पुरानी है । इन सबसे अलग यदि भारतीय काल गणना की बात करें तो हमारे ज्योतिष
के अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ 39 लाख 49 हजार 110 वर्ष है ।
जिसके व्यापक प्रमाण हमारे पास उपलब्ध हैं । हमारे प्राचीन ग्रंथो में एक
एक पल की गणना की गई है ।जिस प्रकार ईस्वी संवत् का सम्बन्ध ईसा से है उसी
प्रकार हिजरी सम्वत् का सम्बन्ध मुस्लिम जगत और हजरत मोहम्मद से है ।
किन्तु विक्रम संवत् का सम्बन्ध किसी भी धर्म से न होकर सारे विश्व की
प्रकृति, खगोल सिद्धांत व ब्रम्हाण्ड़ के ग्रहो व नक्षत्रो से है । इसलिए
भारतीय काल गणना पंथ निरपेक्ष होने के साथ सृष्टि की रचना व राष्ट्र की
गौरवशाली परम्पराओं को दर्शाती है । इतना ही नहीं, ब्रम्हाण्ड़ के सबसे
पुरातन ग्रंथो वेदो में भी इसका वर्णन है ।नव संवत् यानि संवत्सरो का वर्णन
यजूर्वेद के 27 वें व 30 वें अध्याय के मंत्र क्रमांक क्रमशः 45 व 15 में
विस्तार से दिया गया है । विश्व को सौर मण्ड़ल के ग्रहों व नक्षत्रो की चाल
व निरन्तर बदलती उनकी स्थिति पर ही हमारे दिन, महीने, साल और उनके
सूक्ष्मतम भाग पर आधारित है इसी वैज्ञानिक आधार के कारण ही पाश्यात्य देशो
के अंधानुकरण के बावजूद, चाहे बच्चे के गर्भाधान की बात हो, जन्म की बात
हो, नामकरण की बात हो, गृह प्रवेश या व्यापार प्रारंभ करने की बात हो हम एकi
कुशल पंड़ित के पास जाकर शुभ मुहूर्त पुछते हैं।और तो और, देश के बड़े से
बड़े राजनेता भी सत्तासीन होने के लिए सबसे पहले एक अच्छे मुहूर्त का
इंतज़ार करते हैं जो कि विशुद्ध रूप से विक्रमी संवत् के पंचाग पर आधारित
होता है । भारतीय शास्त्ररीत्या कोई भी काम शुभ मुहूर्त में किया जाए तो
उसकी सफलता में चार चाँद लग जाते हैं ।चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा
वर्ष प्रतिपदा कहलाती है। इस दिन से ही नया वर्ष प्रारंभ होता है। ‘युग‘
और ‘आदि‘ शब्दों की संधि से बना है ‘युगादि‘ । आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में
‘उगादि‘ और महाराष्ट्र में यह पर्व ‘ग़ुड़ी पड़वा‘ के रूप में मनाया जाता
है। कहा जाता है कि इसी दिन ब्रह्माजी ने सृष्टि का निर्माण किया था। इसमें
मुख्यतया ब्रह्माजी और उनके द्वारा निर्मित सृष्टि के प्रमुख
देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षस, गंधवारें, ऋषि-मुनियों, नदियों, पर्वतों,
पशु-पिक्षयों और कीट-पतंगों का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का भी
पूजन किया जाता है। इसी दिन से नया संवत्सर शुंरू होता है। अत इस तिथि को
‘नवसंवत्सर‘ भी कहते हैं। शुक्ल प्रतिपदा का दिन चंद्रमा की कला का प्रथम
दिवस माना जाता है। जीवन का मुख्य आधार वनस्पतियों को सोमरस चंद्रमा ही
प्रदान करता है। इसे औषधियों और वनस्पतियों का राजा कहा गया है। इसीलिए इस
दिन को वर्षारंभ माना जाता है। आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में
सारे घरों को आम के पेड़ की पत्तियों के बंदनवार से सजाया जाता है। सुखद
जीवन की अभिलाषा के साथ-साथ यह बंदनवार समृद्धि, व अच्छी फसल के भी परिचायक
हैं। ‘उगादि‘ के दिन ही पंचांग तैयार होता है। महान गणितज्ञ भास्कराचार्य
ने इसी दिन से सूर्योदय से सूर्यास्त तक दिन, महीना और वर्ष की गणना करते
हुए ‘पंचांग ‘ की रचना की थी।चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा को महाराष्ट्र
में गुड़ीपड़वा कहा जाता है। वर्ष के साढ़े तीन मुहुर्तों में गुड़ीपड़वा
की गिनती होती है। शालिवाहन शक का प्रारंभ इसी दिन से होता है। इस अवसर पर
आंध्र प्रदेश में घरों में ‘पच्चड़ी/प्रसादम‘ के रूप में बांटा जाता है।
कहा जाता है कि इसका निराहार सेवन करने से मानव निरोगी बना रहता है। चर्म
रोग भी दूर होता है। इस पेय में मिली वस्तुएं स्वादिष्ट होने के साथ-साथ
आरोग्यप्रद भी होती हैं। महाराष्ट्र में पूरन पोली या मीठी रोटी बनाई जाती
Byहै। इसमें—गुढ़, नमक, नीम के फूल, इमली और कच्चा आममिलाया जाता है। गुढ़
मिठास के लिए, नीम के फूल कड़वाहट मिटाने के लिए और इमली व आम जीवन के
खट्टे-मीठे स्वाhद चखने का प्रतीक के रूप में होते हैं। भारतीय परंपरा में
घरों में इसी दिन से आम खाने की आम का रस बनाने की और आम के रस की मिठाई
बनाने की शुरुआत होती है। शालिवाहन नामक एक कुम्हार के लड़के ने मिट्टी के
सैनिकों की सेना बनाई और उस पर पानी छिड़ककर उनमें प्राण फूँक दिए और इस
सेना की मदद से शक्तिशाली शत्रुओं को पराजित किया। इस विजय के प्रतीक के
रूप में शालिवाहन शक का प्रारंभ हुआ। एक कथा यह भी है कि इसी दिन भगवान राम
ने बाली के अत्याचारी शासन से दक्षिण की प्रजा को मुक्ति दिलाई थी । बाली
के त्रास से मुक्त हुई प्रजा ने घर-घर में उत्सव मनाकर ध्वज (ग़ुड़ियां)
फहराए थे। आज भी घर के आंगन में ग़ुड़ी खड़ी करने की प्रथा महाराष्ट्र में
प्रचलित है। इसीलिए इस दिन को गुड़ीपडवा नाम दिया गया। गुड़ी पड़वा के साथ
ही नौ दिन की चैत्र की नवरात्रि शुरु हो जाती है। नौ दिन तक चलने वाली यह
नवरात्रि दुर्गापूजा के साथ-साथ, रामनवमी को राम और सीता के विवाह के साथ
सम्पन्न होती है।चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि
के दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है। ``मधौ
सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां युगपत्प्रवृत्ति:'' महान गणितज्ञ
भास्कराचार्य ने प्रतिबादित किया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से
दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है। युगों में प्रथम सतयुग का आरंभ भी
इसी दिन से हुआ है। कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ
अति प्राचीनता जुड़ी हुई है। सृष्टि की रचना को लेकर इसी दिवस से गणना की
गई है, लिखा है- चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमे%हनि । शुक्लपक्षे
समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय के
समय से नवसंवत्सर का आरंभ होता है, यह अत्यंत पवित्र तिथि है। इसी दिवस से
पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का सृजन किया था।इस तिथि को रेवती नक्षत्र में,
विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान का प्रथम अवतार मत्स्यरूप का
प्रादुर्भाव भी माना जाता है- कृते च प्रभवे चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा ।
रेवत्यां योग-विष्कुम्भे दिवा द्वा vदश-नाड़िका: ।। मत्स्यरूपकुमार्यांच
अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।। प्रकृति खुद स्वागत करती है इस दिन का चैत्र शुक्ल
पक्ष आरंभ होने के पूर्व ही प्रकृति नववर्ष आगमन का संदेश देने लगती है।
प्रकृति की पुकार, दस्तक, गंध, दर्शन आदि को देखने, सुनने, समझने का प्रयास
करें तो हमें लगेगा कि प्रकृति पुकार-पुकार कर कह रही है कि पुरातन का
समापन हो रहा है और नवीन बदलाव आ रहा है, नववर्ष दस्तक दे रहा है।
वृक्ष-पौधे अपने जीर्ण वस्त्रों को त्याग रहे हैं, जीर्ण-शीर्ण पत्ते पतझड़
के साथ वृक्ष शाखाओं से पृथक हो रहे हैं, वायु के द्वारा सफाई अभियान चल
रहा है, प्रकृति के रचयिता अंकुरित-पल्लवित-पुष्पित कर बोराने की ओर ले जा
रहे हैं, मानो पुरातन वस्त्रों का त्याग कर नूतन वस्त्र धारण कर रहे हैं।
पलाश खिल रहे हैं, वृक्ष पुष्पित हो रहे हैं, आम बौरा रहे हैं, सरसों नृत्य
कर रही है, वायु में सुगंध और मादकता की मस्ती अनुभव हो रही है। सोचिये और
जबाब दीजिये। क्यों न हम सब मिलकर चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात:
सूर्योदय पर नववर्ष का महोत्सव मनायेन और इसके लिये अन्य लोगों को भी
प्रेरित करें??? (कल्पादी-सृष्ट्यादि-युगादि महोत्सव) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
नववर्ष आरम्भ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के प्रात: सूर्योदय की प्रथम रश्मि के
दर्शन के साथ नववर्ष का आरंभ होता है। ``मधौ सितादेर्दिनमासवर्षयुगादिकानां
युगपत्प्रवृत्ति:'' महान गणितज्ञ भास्कराचार्य ने प्रतिपादित किया है कि
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से दिन-मास-वर्ष और युगादि का आरंभ हुआ है। युगों में
प्रथम सतयुग का आरंभ भी इसी दिन से हुआ है। कल्पादि-सृष्ट्यादि-युगादि
आरंभ को लेकर इस दिवस के साथ अति प्राचीनता जुड़ी हुई है। सृष्टि की रचना
को लेकर इसी दिवस से गणना की गई है, लिखा है- चैत्र-मासि जगद् ब्रह्मा
ससर्ज प्रथमे%हनि । शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति ।। चैत्र शुक्ल
प्रतिपदा तिथि के सूर्योदय के समय से नवसंवत्सर का आरंभ होता है, यह
अत्यंत पवित्र तिथि है। इसी दिवस से पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि का सृजन किया
था।इस तिथि को रेवती नक्षत्र में, विष्कुंभ योग में दिन के समय भगवान का
प्रथम अवतार मत्स्यरूप का प्रादुर्भाव भी माना जाता है- कृते च प्रभवे
चैत्रे प्रतिपच्छुक्लपक्षगा । रेवत्यां योग-विष्कुम्भे दिवा
द्वादश-नाड़िका: ।। मत्स्यरूपकुमार्यांच अवतीर्णो हरि: स्वयम् ।। हमारे
वर्ष के आरंभ दिवस का प्रकृति खुद स्वागत करती है,उत्सव मनाती है इस दिन और
हम साधारण-मनुष्य ठंढक के देह-विरोधी प्रतिकूल,अप्राकृतिक मौसम में एक
अविज्ञानिक कैलेण्डर को पूजने में लग जाते हैं। नव-वर्ष चैत्र-प्रतिपदा का
धूम-धड़ाके से मनाएंगे इस बार क्योंकि मैं तो आजाद हूँ,...कानूनी रूप से
भी,दिमागी रूप से भी!!
Friday, July 12, 2019
>इल्लुमिनाति का अंतराष्ट्रीय राजनैतिक षड़यंत्र।
इस्लाम नामक जैविक हथियार का इस्तेमाल करने की साज़िश
मित्रों जब 1400 साल पहले मक्का से मानवता के खून की प्यासी इस्लाम की तलवार लपलपाते हुए जब निकली तो एक एक करके अरब,ईरान,इराक,सीरिया,लेबनान,मिश्र,टर्की,दमिश्क,तुर्किस्तान,अफगानिस्तान,कतर बलूचिस्तान से ले के मंगोलिया और रूस तक टिड्डी दल की तरह ये नर पिशाच ध्वस्त करते चले गए!
स्थानीय धर्मों परम्पराओं का लोप हो गया शान से इस्लाम का राक्षसी झंडा आसमान चूमता हुआ अफगानिस्तान होते हुए सिंध के रास्ते हिंदुस्थान पहुंचा है। यहां तक पहुँचने में करोड़ो हिन्दुओ की लांसे बिछा दी इस इस्लाम नामक टिड्डी दल ने।
ये दिखने में तो मनुष्य की तरह हैं पर विचारधारा मानवता विरोधी और राक्षसी रहती है और इनका रहन सहन ऐसा रहता जैसे ये किसी के कंट्रोल में एक गुलाम रहता है।
इन्हें अल्ला के नाम पर डरा कर रखा जाता है जैसे एक गुलाम डर कर रहता है लेकिन क्या ये अल्ला की गुलामी करते हैं तो मैं कहूंगा नही। फिर ये गुलामी किसकी करते हैं असल मे सवाल ये है तो उससे पहले इस्लाम के जन्म की वास्तविकता जानना जरूरी है।
मित्रो जैसा कि आमजन मानस और किताबो में लिखा गया कि इस्लाम की स्थापना मुंहम्मद ने की और कुरान भी उसी ने लिखी लेकिन अगर आप हदीसो का अध्ययन करेंगे तो वहां बताया गया है कि मुंहम्मद अनपढ़ था और कुरान उसे किसी जिब्राइल नाम के फरिस्ते ने दी थी।
अब सवाल ये है कि जब मुहम्मद अनपढ़ था तो कुरान पढ़ी कैसे और अल्ला का संदेश दिया कैसे?
तो ये मुंहम्मद की इस्लाम स्थापना वाली थ्योरी यही पर झूठ साबित हो जाती है लेकिन अगर आप यहूदियों का धर्म ग्रन्थ तौरेत पढ़ते हैं तो वहां आपको उनका पहला पैगम्बर मूसा मिलेगा और मुसलमानों ईसाइयों का पहला पैगम्बर मूसा ही है बस यही ये तो इनकी पोल खुल जाती है।
यहूदियों का यहूदी मजहब कलयुग के शुरुआत में ही बना था और आज जो खूनी आयते कुरान में मिलती हैं वो कभी तौरेत में हुआ करती थी जिसे अब षणयंत्र के तहत छुपाया गया है।
बाइबिल में भी यही खूनी बाते डाली गई थी जिसे ओल्ड टेस्टामेंट कहकर हटाया गया और न्यू टेस्टामेंट एडिट किया गया था।
असल मे इल्लु के प्रमुख ऐजेंट्स यहूदियों ने ही इस्लाम को बनाया था और वो सारी बाते तौरेत से निकाल के आयतो के माध्यम से कुरान हदीसो में डाली जो सनातन विरोधी थी और एक इस्लाम नाम का ऐसा टिड्डी दल हथियार तैयार किया जो न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का सपना हकीकत में बदलने के लिए सक्षम है।
जैसे एक मशीन कमांड में चलती है वैसे ही ये मुसलमान जेहादी कुरान की कमांड में गुलाम की तरह चलते हैं।
आज आप अपनी वेदों पुराणों की मानवता वाली बातों को मुसलमानो के धर्म ग्रन्थ और उनके रहन सहन से मेल मिलाप करेंगे तो सभी चीजों में विरोधाभास ही मिलेगा क्योकि इस्लाम मे कहीं भी मानवता को डाला ही नही गया। वो तो एक जैविक हथियार है जो 1400 सौ साल पहले बनाया गया जिसका माइंड सेट सिर्फ सनातन को बरबाद करने के लिए किया गया है।
कुरान की सुरा 9 आयत 5 के माध्यम से मूर्ति पूजक हिन्दुओ की हत्या करने का आदेश लिखा गया
हिन्दुओ के पवित्र स्थलों को तोड़ना,उनकी भूमि पर कब्जा करना,उनकी स्त्रियों का बलात्कार करना,उनके मूर्तिपूजा करने पर ऊन्हे काफिर कहकर उनकी हत्या करना।
ये सब मुसलमान जन्म से सिख कर नही आता उसे कुरान से ये सारी मानवता विरोधी बाते सिखाई जाती है जो कि कुरान में उन्हें उनका धर्म बताया गया है और फिर वहां से मिले जिहाद के आदेश को वो प्रत्यक्ष रूप से पूरा करता है।
आज आप कितना भी मुसलमानो को मानवता का पाठ पढ़ाये पर वो वही करेगा जो उसके कुरान में उसे हिदायत मिलेगी।
आज से 400 साल पहले देश के देश बरबाद करने के बाद ये इस्लाम नामक टिड्डी दल भारत आने में काफी कमजोर पड़ गया था क्योकी भारत शूरवीरों की धरती है जिन्होंने इनको इन्ही के तरीके से नष्ट करना शुरू कर दिया था इतिहास से इस्लामिक खिलजी तुग़लकवँशी और मुगलो की बरबादी पढ़ सकते हैं।
जब इल्लु को लगा कि उसका न्यू वर्ल्ड ऑर्डर का सपना धुंधला हो रहा है जिस टिड्डी दल को सनातन विनाश के लिए भेजा था वो कमजोर पड़ रहा तो तो ईसाइयों के साथ यहूदी भारत मे लूट पाट कब्जा के साथ सनातन संस्कृति से खिलवाड़ करने की कोशिश में 300 साल ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से भारतवर्ष पर राज करके सारा इतिहास भूगोल बदल दिया।
शायद किसी को पता नही होगा पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का मालिक ईसाई नही था बल्कि एक नीच यहूदी था। जो पर्दे के पीछे से सारा खेल खेल रहे हैं वो रोथ्स्चाइल्ड और रॉकफेलर कोई और नही यहूदी ही थे। दुनिया के सामने यहूदी ईसाई मुसलमान आपस मे लड़ते हैं और सबकी नजर में इजरायल एकमात्र यहूदी देश है वास्तव में इजराइल कभी न बनता अगर हिटलर उनकी हत्याकांड न करता।
हिटलर जो कि खुद को आर्य कहता था उस को पता था कि ये यहूदी ही सारा खेल कर रहे हैं वो चाहे दुनिया का सबसे महंगा जहाज टाइटैनिक डूबाना हो और उसके फाइनेंस के पैसे से प्रथम विश्व युध्द की तैयारी हो या भारत को गुलाम बनाना हो।
सन 1757 में भारत आई कंपनी ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला गवर्नर Warren Hasting भी एक (JEWS) यहूदी था जो 1774 में गवर्नर बना था उस के बाद वाले भी यहूदी ही थे।
वारेन हेस्टिंग्स ने ही सुप्रीम कोर्ट बनाया था जिसमे न्याय मूर्ति के नाम पर इल्लु के एजेंट बैठकर भारत की सनातन संस्कृति की बरबादी लिखते हैं।
जिस कुरान में शरीयत की बात होती है मुसलमान भी नहीं जानते कि शरियत कानून कैसे बना?
ईस्ट इंडिया कंपनी का गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स जब कम्पनी में कर्मचारी बनकर काम करता था तब भारत में अफीम उगाना और उसे चीन को बेचना यही धंधा करता था। हेस्टिंग्स ने इस ड्रग्स के धंधे में काफ़ी काम किया और खुश होकर ईस्ट इंडिया कम्पनी के यहूदी मालिक रोथ्सचिल्ड ने उसे 1773 से 1785 तक भारत का गवर्नर जनरल बना दिया।
तब सुप्रीम कोर्ट बनाने के साथ वारेन हेस्टिंग्स ने ख़ुद हिन्दू और मुस्लिम पर्सनल लॉ बनाए ।
उसने मुस्लिमों के लिये तीन तलाक़ वाला शरिया कानून बनाया,जो क़ुरान में भी नहीं है और बाद में इल्लु एजेंटों ने इसे हदीस में घुसा दिया। उसी हेस्टिंग्स ने मुस्लिमों को शिया और सुन्नी में बाँटा और टिड्डी दल को दो भागों में बांट दिया।
अल हिदाया और फतवा-ए-आलमगीरी औरंगज़ेब के दरबार में क्रिप्टो यहूदियों द्वारा लिखे गए थे।
जब भारत सत्ता हस्तांतरण हुआ तो हिन्दुओं के सामाजिक कानूनों “धर्म शास्त्रों” को समाप्त तो किया गया पर मुस्लिमों का “शरिया” कानून आज भी चल रहा है ऐसा क्यो? जितने भी इस्लामिक जेहादी संगठन हैं उनको हथियार सप्लाई करने का काम ईल्लु गैंग द्वारा ही किया जाता है । इनके तेल के भंडार भी इसी गैंग के नियंत्रण में है जो सिर उठाता है उसे कुचल दिया जाता है चाहे वो सद्दाम हुसैन हो या गद्दाफी ।
हिन्दुओ (हिंदुस्तान में रहने वाली प्रजा) सावधान हो जाओ दुश्मन बहुत शातिर है और लगातार बढ़ रहा है।
Thursday, July 11, 2019
#Alert #for #Bharatiy #Muslim n #Hindu #Ranajaved
एक पूर्व आतंकी, पूर्व पाकिस्तानी आर्मी का जवान ऐसा सन्देश दे गया जिसकी आवश्यकता पाकिस्तान के मुसलमानों से ज्यादा भारत के मुसलमानों को है।
सुनिए सोचिए आप कहाँ खड़े हैं? इस व्यक्ति ने मरने से पूर्व किन बातों पर अमल करने को कहा?
ऐसे ही नौजवानों से आशा की किरण दिखती है कब वे मुल्लावाद से हटकर अपने स्वयं के मस्तिष्क का प्रयोग करते है।
और जब अपना मस्तिष्क प्रयोग करते हैं तब उनके पैरों से धरती निकल जाती है।
इस्लाम कहीं खतरे में नही है, यदि इस्लाम खतरे में है तो वो आपके अपने दिमाग मे है जो जाहिलियत की जहनियत में बहुत अंदर तक घुस चुका है, अच्छा होगा जाहिलियत से निकले, दुनिया को देखने का ढंग बदले। क्योकि आपको बदलने के लिए इसने अपनी जान कुर्बान कर दी, उसे जाया न जाने दो।
वैसे मर्जी आपकी क्योकि जाहिलियत, फिरकावारियत, मुल्लावारियत से निकलना आपको है।
ये जो मस्जिदों में नमाज के बाद तकरीरे करते हैं ना वो आपको जाहिल बनाए रखने का एक तरीका मात्र है। निकलो इससे, अन्यथा हमे क्या.....? कॉपी -Bhagwa News
आगे पढ़िए....
#तिरंगा #न्यूज़
इससे आगे हिन्दुत्व खतरे मानने वाले हिंदुत्व के नए रक्षक योद्धाओं के लिए भी यही बात हुबहू लागू
यहां भी स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने कुचलने के प्रयास निरन्तर चल रहे हैं । अतः मेरे युवा हिन्दू साथियों आपमे से भी 10 -15 वर्ष में अनेकों लोग #राणाजावेद की तरह सोचने को मजबूर होने वाले हो ......
अभी वक्त है इस पाकिस्तानी युवक की बातों को ध्यान से सुनो यह आपको भी एक संदेश दे रही है कि कट्टरता ने पाकिस्तान को इस्लाम को जिस तरह बदनाम किया है वह हिंदुत्व व हिंदुस्तान को भी बर्बाद करने की ओर अग्रसर है।
अपने सनातन धर्म की खूबियों को राष्ट्र की बहुलतावादी पहचान को बचाने का जिम्मा आपके सर है...
#राणाजावेद की कुर्बानी दुनिया के हर देश के युवा को जगाने के लिए है......
सभी देशवासी आपस मे सद्भावना व प्रेम को कायम रखें दूषित विचारों के प्रसार के वाहक न बनें बल्कि उन्हें फैलने से रोकें। यही सच्ची राष्ट्रसेवा है राष्ट्रप्रेम है राष्ट्रवाद है....