Friday, May 10, 2019

वही कर रहे कुठाराघात ,जिन राज्य व्यवस्थाओं पर था भारतीय विद्या कला शिक्षा के संरक्षण का दायित्व

>ऋषियों और ब्राह्मणों द्वारा राज्य कर्ताओं का चयन : भारत की सनातन परंपरा 
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भारतवर्ष में प्राचीन काल से राज्य कर्ताओं का चयन और उनका प्रशिक्षण करने का दायित्व  ऋषियों और ब्राह्मणों का रहा है. जिनके पास ज्ञान होगा वही तो प्रशिक्षण देंगे और जिनके पास ज्ञान हैं ,वही ब्राम्हण हैं.
 ब्राम्हण वर्ण तो है ही ,जन्म से जाति भी  है क्योंकि कुल परंपरा से उन्हें वह ज्ञान प्राप्त होता था .यदि वह कुल परंपरा उस  ज्ञान की साधना छोड़ दे ,तब उनका ब्राम्हणत्व अवश्य प्रभावी नहीं रह जाता.
 ज्ञान की हजारों शाखाएं हैं और प्रत्येक कुल परंपरा में ज्ञान के किसी एक विशेष अनुशासन में विशेष दक्षता प्राप्त की जाती है. यही कुल परंपरा का महत्व है .
 तो हमारी परंपरा यह रही है कि हमारे ऋषि और ब्राह्मण सदा  समाज में से ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य सहित  अन्य सभी जातियों, सभी वर्णों के कुलों में ऐसे प्रतिभाशाली लोगों का चयन करते थे ,उन पर ध्यान रखते थे और फिर चुनकर उन्हें प्रशिक्षण देते थे ,जो ऐसी सामर्थ्य बीज रूप में रखते हों . चुनने के बाद फिर श्रेष्ठ राज्यकर्ता  के लिए आवश्यक जो भी गुण ,शक्तियां, बल ,विवेक और विद्या आवश्यक है, वह सब उन्हें प्रदान करते थे.उन्हें श्रेष्ठ क्षत्रिय बनाते थे .
 क्षत्रिय वर्ण और शक्ति का अर्थ है जो समाज का रक्षण  करें और  जो रक्षा की जिम्मेदारी  उठायें , वे ही क्षत्रिय हुए .
 आज  वे ऋषि और ब्राह्मण कहां है जो ऐसे छात्रों का चयन करते थे ? ऐसे राज्य कर्ताओं का चयन करने वाले ब्राह्मण और ऋषि आज अगर सामने नहीं दिखाई पड़ते तो क्यों नहीं दिखाई पड़ते ? यह हमें समझना चाहिए.

 वस्तुतः 15 अगस्त 1947  से पूर्व अंग्रेज व्यापारियों द्वारा और उन व्यापारियों की शरण में आकर भारत को ईसाई बनाने वाले पादरियों  द्वारा भारत को ईसाई बनाने का जो स्वप्न देखा जा रहा था . उस पाप पूर्ण उन्माद में  उन्हें  सबसे बड़ा अवरोध यहां के ब्राह्मण और तपस्वी ऋषि तुल्य व्यक्तित्व ही दिखे . वे ही उनकी पाप योजना में बाधक  बने .
 इसीलिए उन्होंने ब्राह्मणों की परंपरा पर ही चोट की,उसे लेकर ही झूठ फैलाया .
 यह अलग बात है कि इसके बाद भी 1947ईस्वी  तक बड़ी संख्या में ब्राह्मणों को संरक्षण प्राप्त था  क्योंकि कभी भी अंग्रेज पूरे भारतवर्ष में शासक नहीं हो पाए थे और देश के हिंदू राजाओं द्वारा भारत में ब्राह्मणों को और अपनी परंपरा के सब विद्वानों को पूर्ण  संरक्षण प्राप्त था.इसीलिए तो 15 अगस्त 1947 ईस्वी तक हमें भारत में ईसाई बहुत ही कम संख्या में दिखाई पड़ते हैं शे.ष भारत में तो वे  कम थे ही ,स्वयं भारत के उस हिस्से में जहां अंग्रेजों का प्रभुत्व था ,हमें 1947 ईस्वी तक बहुत ही कम इसाई दिखाई पड़ते हैं जिनके
 आंकड़े आज सर्वविदित है

 एक हिस्से में अंग्रेजों का शासन होने पर भी भारत में ईसाइयों को अपनी संख्या बढ़ाने में और अपने रिलिजन को फैलाने में अधिक सफलता नहीं मिली तो इसका कारण हमारी विद्या परंपराओं का और उसके अधिकारी विद्वानों का, ब्राह्मणों का समाज में प्रतिष्ठित और संरक्षित सुरक्षित रहना ही था .परंतु 1947 ईस्वी में 15 अगस्त के बाद जिन लोगों ने अंग्रेजो से सहयोग कर उनके सहयोगी के रूप में भारत में सत्ता संभाली ,उन्होंने भारत में अभूतपूर्व तेजी से ईसाइयत  को फैलाया और ईसाई मिशनरियों को भरपूर  संरक्षण दिया.

 उसका कारण यह था कि अंग्रेजों को तो सदा ही यह भय था कि यदि हम हिंदू धर्म पर किसी भी प्रकार का आघात करेंगे तो हमें उखाड़ फेंका जाएगा . परंतु अब अंग्रेजों से सहयोग कर जिन लोगों ने सत्ता संभाली उन्हें यह भय नहीं रहा क्योंकि वह शरीर से हिंदू हैं और बाद में तो यह स्थिति आई कि विद्या और संस्कार से तो यह लोग हिंदू नहीं ही रहे,विदेशी मूल वाले  ईसाइयों तथा अन्य मज़हबों की कन्याओं से विवाह कर वे शरीर से भी हिंदू नहीं रहे परंतु तो भी उनका ऊपरी आवरण अथवा नाम मात्र की उपाधि हिंदू बने रहने के कारण
 वह निशंक होकर भारत से हिंदू धर्म का उच्छेदन  करने के लिए ब्राह्मणों के विरुद्ध अभियान चलाते रहे और भारत की विद्या परंपरा को नष्ट करने के लिए बहुत व्यापक स्तर पर राज्य तंत्र का बल पूर्ण प्रयोग करते रहे तथा ईसाईयत  और इस्लाम को विशेष संरक्षण देकर भारत में हिंदू धर्म के विनाश के लिए कार्य करते रहे .

इससे स्पष्ट है कि ब्राह्मणों की निंदा करने और ब्राह्मणों को विशेष संरक्षण  नहीं देने --इन दोनों ही कार्यों के पीछे एकमात्र प्रयोजन हिंदू धर्म को और भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करना है और यह प्रयोजन  इतना घृणित , गर्हित , कुत्सित है कि इसे सीधे तो नहीं ही कहा जा सकता ,इसे पूरी तरह ढंकना आवश्यक है . इसीलिए  झूठ बोल कर इसे बहुत ऊंचे ऊंचे लक्ष्यों से जोड़ कर प्रचारित किया गया ताकि समाज का ध्यान ही वास्तविक प्रयोजन की ओर न जाए और प्रायः ब्राह्मण घरों के ऐसे संस्कारों वाले बच्चे ही इस अभियान और इस प्रयोजन में हिंदू धर्म के नाशकर्ताओं के सहायक बने जिनके संस्कार समाज के लिए त्याग और आत्मोत्सर्ग के थे.   अपने हित और अपने कल्याण का त्याग करने और अपने निजी स्वार्थ का  उत्सर्ग करने के संस्कार जिन घरों में थे , उन्हें ही प्रेरणा दी गई कि तुम हिंदू धर्म के नाश के लिए प्रायोजित इस अभियान में
 उत्साह  के साथ सहायक बनो  क्योंकि  इसके द्वारा हिंदू समाज का उत्कर्ष होने वाला है और शताब्दियों से कोई भारी अन्याय यहां हो रहा था ,जिसे समाप्त किया जा कर कोई तथाकथित समतामूलक समाज स्थापित होने वाला है जो तुम्हारे लिए गौरव की बात है .
 अपने समाज को गौरवशाली बनाने के लिए त्याग और उत्सर्ग  के जिनमें संस्कार थे ,  ऐसे संस्कारी घरों के परंतु ज्ञान परंपरा से रहित और सम्यक  शिक्षा से वंचित तथा कुशिक्षा से दीक्षित और ग्रस्त ऐसे  पूर्व संस्कारी परिवारों के बच्चे इस घृणित अभियान में सबसे बड़े माध्यम बनाए गए.
भारतीय विद्या परंपरा को और उसके वाहक  ब्राह्मणों और ऋषियों को संरक्षण और पोषण देने वाले राजा और राजन्य   वर्ग और धनी वैश्य वर्ग होते थे इसलिए अंग्रेजों के सहयोगियों ने जो शरीर से हिंदू थे, योजना पूर्वक इन दोनों ही वर्गों पर चोट की.
 सबसे पहले तो उन्होंने राजाओं के विरुद्ध अभियान चलाया और देशभक्ति का ज्वार देश में उभरता  देखकर राजाओं ने भी खुशी-खुशी अपने राज्य का विलय भारत संघ में कर दिया क्योंकि तब तक किसी को यह कल्पना नहीं थी कि लोकतांत्रिक भारत में यहां के बहुसंख्यको के धर्म संस्कार और विद्या ,सब का नाश करने की कोई कल्पना भी करेगा ,योजना बनाना तो बहुत दूर की बात है.
 इस प्रकार राजन्य वर्ग भी भ्रम में पड़ गया.
 फिर भी अपने पूर्व संस्कारों के कारण हमारे पूर्व राजा पूरी तरह ब्राह्मणों को और भारतीय  विद्याओं को संरक्षण देते रहे ,जैसा कि सभी देशी राजघरानों की राजधानियों में देखा जा सकता है .
परंतु 1971 में प्रिवी पर्स की समाप्ति के साथ उनके जो न्यूनतम स्त्रोत बचे थे ,वह भी छीन लिए गए और इसके बाद वे ब्राह्मणों और भारतीय विद्याओं के संरक्षण की स्थिति में नहीं बचे यद्यपि उन्होंने संस्कार वश प्रायः अपनी निजी संपत्ति को बेचकर भी अपना वह पुण्य प्रवाह गतिशील रखा .
फिर भी दीर्घ काल  से पोषित इस भारतीय ज्ञान परंपरा, विद्या परंपरा और संस्कृति का वृक्ष मूल रूप में तो अभी भी विद्यमान है परंतु उसकी शाखाओं का फैलाव रुक गया है और तने पर भी चोट की जा रहीहै .

 वर्तमान में भारत में दो प्रकार के लोग शासन कर रहे हैं : एक है कालनेमि प्रकार के लोग और दूसरा मूढ़वर्ग .’
 कालनेमि प्रकार के लोग तो स्वयं को भारतीय  बताते हुए  इस विद्या परंपरा पर कुठाराघात कर रहे हैं जबकि  मूढ़ लोग उनके द्वारा प्रचारित विज्ञापनों और अफवाहों  तथा झूठे दावों को सत्य मान कर उन्हें सचमुच राष्ट्र के कल्याण के लिए कार्य कर रहा हुआ मानकर उनकी उन तमाम गलत बातों में  सहयोगी बन जाते  है जो बातें हमारे ब्राह्मण वर्ग पर, हमारे  राजन्य वर्ग पर और हमारे संस्कारी वैश्य घरों पर  कुठाराघात करने वाली हैं . .भारत की ज्ञान परंपरा पर  और हमारी विद्या परंपरा  पर निरंतर चोट करने वाली है .
इस प्रकार यह कालनेमि और मूढ़ - दोनों ही वर्गों के द्वारा भारत में शासन चल रहा है और यह शासन  भारतीय संस्कृति ,भारतीय विद्या परंपरा और भारतीय ब्राम्हण परंपरा को नष्ट करने के  अभियान से संचालित है . इस स्थिति को समझने की आवश्यकता है.
 यह अवश्य है कि ज्ञान कभी भी पूरी तरह नष्ट नहीं होता .परंतु वह लुप्त हो जाता है ,उसका दिखाई पड़ना बंद हो जाता है . “लुप अदर्शने “के  अर्थ में अ -दर्शन ही लोप है .
अतः ज्ञान समाप्त नहीं हुआ है और तप  के द्वारा वह प्रकट हो सकता है.
 इसलिए जिन लोगों को भारतीय विद्या परंपरा में गहरी श्रद्धा है और भारतीय ब्राह्मणों के प्रति सच्ची श्रद्धा है उन्हें अवश्य तप करना चाहिए और शासन व्यवस्था को ,भारतीय विद्या परंपराओं ,भारतीय ज्ञान परंपरा और श्रेष्ठ सामाजिक परंपराओं की संरक्षक बनाने के लिए काम करना चाहिए क्योंकि अन्यथा ऐसे तो कालनेमि लोग  योजना पूर्वक और मूढ़  लोग अनजाने ही भारत की विद्या और भारत के ब्राह्मण परंपरा का नाश करते रहेंगे .  .

 ऐसे में समाज को बलशाली बनाने वाली क्रियाशीलता बहुत आवश्यक है परंतु सबसे अधिक आवश्यक है इस तथ्य का संज्ञान लेना कि भारत में भारतीय विद्या परंपरा का और ब्राह्मणों का ,ब्राह्मणों की परंपरा और उनके संरक्षण की परंपरा का विनाश समाज के भीतर से नहीं हुआ है ,समाज में तो अभी भी ब्राह्मणों के प्रति गहरा  आदर है .यह सब पाप कर्म तो भारत के राज्य के द्वारा हुआ है और इसीलिए आवश्यक है कि भारत में एक ऐसा राज्य प्रतिष्ठित हो, ऐसी शासन व्यवस्था  आए जो भारत की विद्या परंपरा को ,  इसके  राजन्य वर्ग को ,धर्म पूर्वक धन अर्जन   की वैश्य परंपरा को भरपूर संरक्षण दे.
    हिंदू समाज के प्रति शत्रुता  का भाव रखने वाला राज्य कभी भी भारत राष्ट्र को , हिंदू समाज को शक्तिशाली और स्वस्थ नहीं बना सकता.
 अपना राज्य आवश्यक है  और इसीलिए जो भी कोई  ब्राम्हण और विद्वान एवं ऋषि  इस  वक्त समकालीन भारत में हैं ,  उन्हें अधिकतम ताप कर के, सुयोग्य राज्यकर्ताओं की  खोज करना और उनको  प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वे राज्यकर्ता भारत में स्व  राज्य और  सु राज्य स्थापित कर सके.
 अपने राज्य के बिना अपनी विद्या का, ब्रह्मा विद्या का और अपरा विद्याओं का और ब्राम्हण परंपरा का संरक्षण नहीं हो सकता और जहां ब्राह्मण परंपरा का संरक्षण नहीं होगा ,वहां क्षात्र  धर्म की परंपरा, समृद्धि साधना की परंपरा तथा शिल्प और अन्य सभी श्रेष्ठ कर्मों  की महान परंपराओं का भी कोई संरक्षण नहीं होगा .वहां तो भारत को पूरी तरह  भारतीयता  से रहित बनाने वाले काम ही होते जाएंगे .
अतः अपना राज्य होना सबसे पहले आवश्यक है और ऐसे राज्य कर्ताओं का चयन और प्रशिक्षण आवश्यक है जो स्वराज्य स्थापित कर सकें .
जो भी थोड़े बहुत ब्राम्हण और ऋषि समकालीन भारत में बचे हों ,  यह  उनका सर्वोपरि कर्तव्य है, ऐसा मुझे लगता है और वे संभवतः इस दिशा में कार्य कर  भी रहे हों क्योंकि भारत माता वीर प्रसविनी और  तेजोमयी हैं , वे ऐसे तपस्वी ब्राह्मणों एवं ऋषियों से रहित नहीं हो सकतीं साभार कुसुमलता केडिया

2 comments:

  1. उत्तम अति उत्तम।

    क्या यह संभव है कि ब्राह्मण या अन्य वर्ग शासन में ऐसे लोगों को ला सके ? भारत से जब तक जाती व्यवस्था और आरक्षण व्यवस्था जब तक समाप्त नही होती तब तक वर्ण व्यवस्था लाना असंभव नहीं तो अत्यंत कठिन जरूर है।

    फिर ब्राह्मण तो वह है जो ब्रह्म को जानता हो। कहा है "जन्म जात शुद्र सर्वे, कर्मेंनु ब्राह्मण भवति"। भूतकाल में कई जन्म से शुद्र या क्षत्रिय या वैश्य ब्राह्मण बने है। इतिहास साक्षी है। वेदव्यासजी, वाल्मीकि, रविदास जी, मीरा, नानकदेव, गौतम बुद्ध इत्यादि।

    भारत की पश्चिमी शिक्षा व्यवस्था जब तक गुरुकुल पद्धति से नहीं होती तब तक यह संभव नहीं की हैम शाषन में धर्मवान ईमानदार चरित्रवान सेवाभावी व्यक्तियों को ला पावें, क्योकि ऐसे व्यक्ति बालक से ही वयस्क होंगे।

    और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि ऐसे गुरु जो ब्रह्मज्ञान, परा विद्या का ज्ञान रखते हो कहाँ से लाएँगे क्योकि इसकी शिक्षा तो मात्र गुरूकुल द्वारा ही उन्हें मिल सकती है?
    धन्यवाद। शुभकामनाएं।
    इति शुभ।
    D S

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  2. चूँकि सबसे महत्वपूर्ण बिंदु ऐसे ब्रह्म ज्ञानी गुरु कैसे मिले, उसके समाधान के लिए एक गुरुकुल मध्यप्रदेश में चलाने के लिए गुरु की आवश्यकता पर उनकी निम्न योग्यताओ के लिए सुझाव दिए थे। कृपया गौरतलब करावे, तथा देखे यदि यह कोई काम आ सके। धन्यवाद। शुभकामनाएं।
    **********************
    Necessary qualifications for selection of 👌🏽Guru in an ideal Gurukul.
    एक श्रेष्ठ गुरूकुल में गुरु जी के चयन के लिए आवश्यक योग्यताऐं।


    1. A Guru should be capable of eradicating doubts of his or her disciples or students. एक गुरु को शिष्य के सभी भ्रम का समाधान करने की क्षमता होनी चाहिए |

    2. A Guru ought not be a hypocrit, nor a sinner, nor an atheist, nor immoral or lewd, and have NO illicit relations with women. गुरु पाखंडी नहीं हो , पापी नहीं हो , नास्तिक नहीं हो, दुराचारी नहीं हो, अबला और स्त्रीओ से अवैध संबंध न हो ।

    3. A Guru shouldn't be egoistic and proud. अहंकारी और अभिमानी न हो।

    A Guru shouldn't criticize others. दूसरे की निंदा करने वाला न हो ।

    A Guru shouldn't be senile, and naughty. सठ नहीं हो; नटखट नहीं हो ।

    6. A Guru ought not to have anger and not be cruel. क्रोधी न हो; क्रूर न हो ।

    7. A Guru shouldn't involve in arguments and disputes. कुतर्की और विवादी न हो ।

    8. A Guru shouldn't be greedy. लोभी न हो।

    9. A Guru shouldn't be devoid of equanimity, nor be despair or woeful. समतारहित न हो, विषादी न हो ।

    10. A Guru should do selfless service and help to everyone. हमेशा परमार्थ वादी हो।

    11. A Guru should be compassionate. दयावान हो ।

    12. A Guru ought to be the embodiment of unbreakable Truth. Ought to speak the Truth always and none else. हमेशा अखंड सत्य व्रत का धारण करने वाला हो ।

    13. A Guru should dress modestly, no different than normal. भद्र वेशभूषा धारण करने वाला हो ।

    14. A Guru ought to have a pleasant and happy posture. सुन्दर प्रसन्न मुद्रा वाला हो ।

    15. A Guru ought to be knowledgeable, eminently righteous and loving to his disciples. ज्ञानवान, धर्म धुरंधर हो, शिष्यों से प्रेम करने वाला हो ।

    16. A Guru's supreme goal ought to be the well being of his or her disciples. शिष्यों का भला ही सर्वेपरी हो ।

    16. A Guru ought to know the scriptures and motivate consciousness of the disciples for morals and ethics. शास्त्रों का ज्ञाता हो तथा शिष्यों को अच्छी नीति सिखानेवाला हो ।

    17. A Guru should never have anger, always speak soft and sweet words. जिनके सपने में भी क्रोध न हो; जो मीठी बोली और वचनो वाला हो ।

    18. A Guru ought to advise everyone with love and affection. जो सब को प्रेम से उपदेश देने वाला हो ।

    19. A Guru ought to know the secret of intake and exhalation. निगमागम रहस्य को जानने वाला हो ।

    20. A Guru ought to love discipline. अनुशाशन प्रिय हो ।

    21. A Guru ought to be helpful to all without any attachment. निष्प्रह हित करने वाला हो ।

    22. A Guru ought to be forgiving and pardoning. क्षमावान हो ।

    23. A Guru must be contended. संतोषी हो ।

    24. A Guru ought to be supremely thoughtful. परम विचारवान हो।

    25. A Guru ought to be liberated from all worldly things including the cycle of life and death. भवमुक्त हो ।

    26. A Guru ought to be devoid of greed, attachment, and pride. लोभ, मोह, मद , रहित हो ।

    27. A Guru ought to be dispeller of attachment, hatred, sorrows and conflicts in the disciples. शिष्यों के राग, द्वेष दुःख, दवंद को निवारण करने वाला हो ।


    With best wishes for your health and happiness, and regards, sincerely, ds
    Durgashanker Nagda
    Ashram,

    www.ashramom.org
    US Phone: 407-335-3367 (Cell)
    ashramflorida@gmail.com

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