रुपया का मूल-
कल एक पोस्ट देखा जिसमें रुपये के सिक्के का फोटो था तथालिखा था कि शेरशाह के समय इसका चलन आरम्भ हुआ। ऐसा वर्णन होता है जैसे शेरशाह के ५ वर्ष राजा होने के समय ही भारत में सभ्यता का आरम्भ हुआ था। वह किसी एक स्थान पर टिक नहीं पायाq था। जब बंगाल की तरफ बढ़ा तो बक्सर के पश्चिम का भाग हाथ से निकल गया था। जब उन पर कब्जा करने निकला तो बंगाल निकल गया। कालिंजर तक पहुंचा जहां के किले में उसकी मृत्यु हुई। तो उसने ग्रैण्ड ट्रंक रोड कब और कैसे बनवाया। ५ वर्ष में अपने रहने का घर नहीं बनवा सका, मरने के बाद सासाराम में मकबरा कैसे बन गया? उसकी मृत्यु के बाद उसका लड़का मुगलों के मुकाबले के लिये पहले हेमचन्द्र विक्रमादित्य का सेनापति था उसके बाद राणा प्रताप के सेनापति के रूप में मारा गया। सासाराम का मूल है सहस्रराम-या तो यहां परशुराम का जन्म हुआ था या यहां सहस्रार्जुन को मारा था। अतः यह परशुराम मन्दिर था।
स्पष्टतः शेरशाह के पहले भी भारत में मुद्रा का चलन था जिनके नाम बदलते रहे हैं।
भारत में मुस्लिम शासन में भी कभी दीनार का प्रचलन नहीं हुआ। यह मूलतः यमन में व्यवहार होता था-बाद में अलजीरिया, ट्यूनिसिया, लिबिया, युगोस्लाविया, कुवैत आदि में फैल गया। पर पश्चिमोत्तर भारत (पाकिस्तान) में मिली पुरानी गणित पुस्तक में दीनार मुद्रा का हिसाब दिया है-
१ सुवर्ण = १ १/३ दीनार = २ २/३ द्रंक्षण = १६ धानक = ८० रक्तिका (रत्ती?)
१ दीनार = २ द्रंक्षण, १ द्रंक्षण = ६ धानक, १ धानक = ५ रक्तिका।
बिहार के रोहतास जिले में भी एक दिनारा है जो पुराना बाजार था।
शिवाजी के समय में हूण भी एक सिक्का था था। ओड़िशा में प्रायः ८०० वर्ष पहले जगन्नाथ मन्दिर बनाने में १२.५० करोड़ माड़ (स्वर्ण मुद्रा) खर्च हुई थी जबकि राज्य की वार्षिक आय ५० करोड़ थी। ३ वर्ष में इतना भक्तों के चढ़ावे में मिला था। १ मोहर = २ माड़ा।
सिक्के पर संख्या या चित्र टंकित होने के कारण उसे टंका भी कहते थे।
पण (बाजार) में व्यवहार होने के कारण मुद्रा का नाम कार्षापण था। इनके नाम समय तथा क्षेत्र के अनुसार बदलते रहे हैं। पर ३ स्तर के स्थायी नाम वेद-पुराणों में मिलते हैं-
सामान्य मुद्रा-धेनु (चान्दी का)-क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः\ यदा वृत्राणि जङ्घनदथैनं मे पुनर्ददत्॥ (ऋक् ४/२४/१०)= कौन मेरी इन्द्र प्रतिमा को १० धेनु में खरीदेगा और वृत्र वध से इन्द्र के लौटने पर वापस कर देगा?
गौ का मूल्य धेनु से अधिक था। सूर्य से आती ऊर्जा को गौ कहा गया है और दिन में उसका जो भाग पृथ्वी को मिलता है उसका अंश सायंकाल निकलना शुरु होता है जिसे धेनु कहा गया है-अग्निं तं मन्ये यो वसुः (पृथ्वी में वास) अस्तं यं यन्ति धेनवः। (ऋक् ५/६/१) गो का अर्थ किरण अहि और उस अर्थ में स्वर्ण मुद्रा को भी कहते थे। पुराणों में कहानी है कि राजा लोग १० लाख गायें दान देते थे। इतनी गायों को रास्ते पर ले जाना या उनका घर में पालन करना किसी परिवार के लिये सम्भव नहीं है। यह मुद्रा की ही इकाई हो सकती है।
मनुस्मृति में निष्क को बड़ी मुद्रा कहा है पर बाद में यह छोटी मुद्रा हो गयी। निष्क से पंजाबी में निक्का (छोटा) या निकेल धातु हुआ है। मनुस्मृति अध्याय ८ के मान-
जालान्तर्गते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः।
प्रथमं तत्प्रमाणानां त्रसरेणुं प्रचक्षते॥१३२॥
त्रसरेणवोऽष्टौ विज्ञेया लिक्षैका परिमाणतः।
ता राजसषपस्तिस्रस्ते त्रयो गौरसर्षपः॥१३३॥
सर्षपाः षट् यवो मध्यस्त्रियवं त्वेककृष्णलम्।
पञ्चकृष्णलको माषस्ते सुवर्णस्तु षोडश॥१३४॥
पलं सुवर्णश्चत्वारः पलानि धरणं दश।
द्वे कृष्णले समधृते व्ज्ञेयो रौप्यमाषकः॥१३५॥
ते षोडश स्याद्धरणं पुराणश्चैव राजतः।
कार्षापणस्तु विज्ञेव्यस्ताम्रिकः कार्षिकः पणः॥१३६॥
धरणानि दश ज्ञेयः शतमानस्तु राजतः।
चतुः सौवर्णिको निष्को विज्ञेयस्तु प्रमाणतः॥१३७॥
=छिद्र से सूर्य की किरण मार्ग में जो सूक्ष्म धूलि कण दीखते हैं वह त्रसरेणु है जो पहला मान है।
८ त्रसरेणु = १ लिक्षा, ३ लिक्षा = १ राजसर्षप, ३ राजसर्षप = गौरसर्षप।
६ गौरसर्षप = मध्य यव, ३ मध्ययव = १ कृष्णल, ५ कृष्णल (रत्ती) = १ माष (माशा), १६ मासा (१६ आना, शिवसूत्र का आणव मल) = १ सुवर्ण।
४ सुवर्ण = १ पल (भार के माप), १० पल = १ धरण
२ कृष्णल के भार का रौप्यमाषक= इतने वजन का की चान्दी का रुपया। रौप्य का अर्थ चान्दी भी है। इसका अन्य अर्थ करते हैं कि सिक्के पर रूप (अंक, या आकृति) बनाते हैं।
१६ रौप्य माषक = रौप्यधरण या राजत या चान्दी का पुराण।
ताम्बे के कर्ष (पैसे) को कर्ष तथा पण कहते हैं।
१० धरण = शतमान राजत (१०० रुपया)।
भार से ४ सुवर्ण = १ निष्क।
रूप्य (रुपया) के अर्थ-आहतं रूपं अस्यास्तीति। रूप + रूपाद्आहतप्रशंसयोर्यप् (५/२/१२०) इति यप्। आहतस्वर्णरजतम् (अमरकोष २/९/९१)। हेम रुप्यश्च आहतं अश्ववराहपुरुषादि रूप्यमुच्यते रूपाय आहतं रूप्यं (इति भरतः)।
महाभारत (५/३९७९)-
सुवर्णस्य मलं रूप्यं रूप्यस्यापि मलं त्रपु।
ज्ञेयं त्रपु मलं सीसं सीसस्यापि मलं मलम्॥
खजाने का मालिक रूप्याध्यक्ष या नैष्किक (अमरकोष २/८/७)।
अमरकोष (२/९/८४-९१) में भी मुद्रा या भार मानों के पर्याय शब्द दिये हैं।
रुपया ढालने या काटने के लिये सांचा को तक्षशिला कहते थे जिससे टकसाल हुआ है।
अरुण उपाध्याय
“रूपा” शायद लड़कियों के नाम के तौर पर आपने सुना होगा | अक्सर बंगाली लड़कियों का नाम होता है | दरअसल रूपा का मतलब होता है चांदी | बांग्ला में अभी भी चांदी को “रूपा” ही बुलाया जाता है | संस्कृत में भी “रूप्यकं” जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है | भारतीय लोगों के चांदी के शौक का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि जो पान, या फिर मिठाइयों पर पतला सा चांदी का वर्क लगाया जाता है, सिर्फ़ उसके लिए हर साल भारत में करीब 13 टन चांदी इस्तेमाल होती है | एक टन मतलब, 10 क्विंटल, और एक क्विंटल मतलब सौ किलो तो 13000 किलो चांदी तो हम लोग खा जाते हैं हर साल |
सीधा अरब से सम्बन्ध रखने वाले मुस्लिम खुद को अश्रफ़ कहते हैं, उनके नाम पर राजसी मोहर वाले सोने के सिक्कों को अशर्फी कहा जाने लगा था | बाद में जब शेर शाह सूरी ने भारत में चांदी के सिक्के जारी किये तो चांदी को रूपा बुलाये जाने के कारण इसे रुपया बुलाया जाने लगा | भारत में चलने वाली मुद्रा का भी इतिहास कई लोगों को असहज कर सकता है |
आनन्द कुमार
उज्जयिनी चिह्न : जिसे मुद्रा पर मान्यता मिली
बात 124 ईस्वी की होगी। सातवाहन राजा गौतमीपुत्र शातकर्णी ने क्षहरात क्षत्रप नहपान के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए युद्ध का निश्चय किया और महाराष्ट्र के पास जुन्नर नामक जगह पर न केवल उसके शिकस्त दी बल्कि तलवार के घाट भी उतार भी दिया। नहपान (119-124 ई.) मुद्रा के सहारे त्रिभाषा सूत्र का पहला प्रयोगधर्मी था। उसके सिक्के चांदी के होते थे और सिक्कों पर पूर्वभाग पर उसकी छवि के साथ ही यूनानी लेख था जबकि पृष्ठभाग पर वज्र सहित बाण जैसे आयुध के साथ तत्कालीन ब्राह्मी लिपि में ''राज्ञो क्षतृरातस नहपानस'' और खरोष्टी लिपि में ''रजो छहरतस नहपनस'' लेख उत्कीर्ण होता था।
गौतमीपुत्र शातकर्णी ने नहपान पर जीत दर्ज करने के साथ ही उसके अधिकार क्षेत्र की टकसाल सहित जन-सामान्य से सिक्कों का संग्रह किया। यों तो पहले के शासक जीत के बाद हारे हुए शासकों के सिक्कों को गलाकर अपनी मुद्रा जारी करते थे लेकिन शातकर्णी ने नहपान के सिक्कों को गलाया नहीं। उसने उन सिक्कों के पुनर्लांछित या पुनर्टंकित किया। नासिक के पास जोगळटेंभी नामक जगह से नहपान के गड़े हुए 13,250 सिक्के मिले हैं जिनमें से 9270 सिक्कों को पुनर्चक्रण के लिए पुनर्टंकित किया गया है। इससे पूर्व इस प्रकार का एक प्रमाण सिकंदर के सिक्के का मिलता है।
राजाज्ञा से पुनर्चिह्न के रूप में नहपान के सिक्के पर मेरुगिरि पर उदित होते हुए चंद्रमा या सूर्य और 'उज्जयिनी चिह्न' का प्रयाेग किया। यह चिह्न उससे पहले प्रयोग में था या नहीं, मालूम नहीं मगर इस चिह्न ने सिक्कों पर एक शैवनगरी को प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण बनाया। इस चिह्न के रूप में दो डेंबल्स का प्रयाेग किया गया है अथवा चार वृत्तों का, यह विचारणीय है मगर चार वृत्त बहुत विचार के साथ प्रयोग में लाए गए हैं क्योंकि उन वृत्तों के भीतर छोटे वृत्त मिलते हैं, यह कुंड की मेखला की तरह है या जलहरी सहित शिवलिंग की तरह, यह विचारणीय है, क्योंकि वृत्तों के भीतर पुन: नंदिपद और स्वस्तिक के चिह्न बनाए गए हैं।
इस प्रकार के वृत्तादि का रूपांकन रेखांकन के संदर्भ में वैदिक शुल्बसूत्र से विचारित है। ये चार वृत्त चतुरंगिणी सेना के परिचायक हैं अथवा चार सागर के क्योंकि उस काल तक पृथ्वी पर चार सागरों की मान्यता ही थी। ये चार संघों के बोधक भी हो सकते हैं या चार आश्रमों के... यह सोचने वाली बात हैं। मगर, यह जरूर हो सकता है कि महाकाल की नगरी को केंद्र माना गया था ऐसे में यह चिह्न विकसित हुआ हो। मगर, बात बड़ी रोचक है,, उज्जैन के पुराविद डॉ. रमन सोलंकी कहते हैं कि यह चिह्न उन मुद्राओं पर भी मिला है जो यहां से रोम पहुंची थी यानी रोम तक उज्जयिनी चिह्न स्वीकार्य रहा, और आज की मुद्रा... बस यही विचार योग्य है।
संकलन अजय कर्मयोगी

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