यह लेख अत्यंत प्रभावी वह हृदय स्पर्शी है पर लेखक यह नहीं समझ पाया है कि इस सब की जड़ कहां पर है क्यों ऐसा दीन हीन विधर्मी अत्याचारी दुराचारी प्रजा भारत की हुई है। जिससे वह समाधान की अपेक्षा में बैठा है वहां भी विधर्मी विकृत और विदेशी एजेंट का कब्जा है और तो और इस भाई ने जिस श्रेष्ठ ग्रंथ का उल्लेख किया है वह भी अंग्रेजो के द्वारा विक्रित की गई है और मूल प्रति तो उपलब्धि भी नहीं है मनुस्मृति वह अन्य स्मृतियों और शास्त्रों में भी यह काम बहुत विशेष हुआ है । पर लेख आपको सोचने के लिए मजबूर कर देगा कृपया सनातनी भाई अपनी दृष्टि से भी समझने का प्रयास करेंगे
अजय कर्मयोगी
यह दशा हुई है कैसा होना चाहिए हिन्दुओं का धार्मिक संगठन ?
भारत में हिन्दुओं के हित में कार्य करने वाले अनेकों संगठन जैसे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद्, राम सेना, शिव सेना, हिन्दू युवा वाहिनी, आर्य समाज आदि कार्यरत हैं और इसके साथ ही भारत में चार मठ, कई पीठें आदि धार्मिक निर्णय करने वाली हिन्दू संस्थाएँ विद्यमान हैं । लेकिन इतना सब होने के बाद भी भारत के हिन्दू समाज की समस्याएँ समाप्त होने के बजाए बढ़ती जा रही हैं :- लव जिहाद, धर्मांतरण, बलात्कार, आर्थिक शोषण, मंदिरों के दान का दुरुपयोग, गौहत्या, माँसभक्षण, उच्छश्रृंखलता, पश्चिमी कुसंस्कार, व्याभिचार, भ्रूणहत्या, जातीवाद, प्रांतवाद, भाषावाद, व्यर्थ छुआछूत, दरिद्रता, सामूहिक पलायन आदि अनेकों सामाजिक बुराईयाँ हिन्दू समाज में दूर नहीं हो पा रही हैं । इसका मुख्य कारण है सशक्त संगठन का अभाव होना । और एक सशक्त संगठन किस प्रकार का होता है उसके मापदंड यहाँ कहे जाते हैं :-
दशावरा वा परिषद्यं धर्मं परिकल्पयेत् ।
त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत् ।।
( मनुस्मृति १२/६० )
त्रैविद्यो हैतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः ।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिवत्स्याद्दशावरा ।।
( मनुस्मृति १२/६१ )
धर्म परिषद् में कम से कम इन दश व्यक्तियों की सभा होनी आवश्यक है ( तीन वेदों के विद्वान ऋग्वेद- यजुर्वेद-सामवेद, वैय्याकरण, नैरुक्त, नैय्यायिक ( तर्कशास्त्रवेता ), धर्माध्यापक ( गृहस्थी ), ब्रह्मचारी, सनातक ( गुरुकुल पठित ) और वानप्रस्थी । इन दस प्रकार के व्यक्तियों की सभा ही धर्मसभा या धर्म परिषद् कहलाती है ।
यदि ये दश व्यक्ति धर्मसभा में न हों तो कम से कम तीन की सभा तो अवश्य होनी चाहिए इसके लिये प्रमाण :-
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च ।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयमिर्णये ।।
( मनुस्मृति १२/६२ )
ऋग्वेदवित्, यजुर्वेदवित् और सामवेदवित् इन तीनों की सभा धर्मसंशय अर्थात् सब व्यवहारों के निर्णय के लिये होनी चाहिए ।
इससे पता चलता है कि सशक्त संगठन के लिये ये आवश्यक है कि उसमें रहने वाले मनुष्य पूर्ण विद्वान हों । क्योंकि बिना विद्वानों के वह सभा नहीं कहाती । इसके लिये मनुजी कहते हैं कि :-
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपदीविनाम् ।
सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ।।
( मनुस्मृति १२/६४ )
जो ब्रह्मचर्य, सत्यभाषण आदि से रहित, वेदविद्या से रहित जन्ममात्र से ही शुद्रवत हैं ( जिन्होंने उपनयन करवाकर द्विजरूप धारण नहीं किया और मुर्ख ही रहे ) उन सहस्त्रों मनुष्यों को मिलने से भी सभा नहीं कहाती ।
इससे स्पष्ट होता है कि हमारे जितने भी संगठन हैं वे आखिर क्यों निर्णय करने में विफल हो रहे हैं ? क्योंकि इन सबमें वेदवित् विद्वानों, तर्कशास्त्रीयों, व्याकरण के ज्ञाताओं, तुरंत वेदार्थ करने में समर्थ नैरुक्तों आदि का न होने से इन संगठनों में अपरिपक्व लोगों की भरमार रहती है । इसी कारण इन संगठनों की निष्क्रीयता के कारण ही बेलगाम हिन्दू समाज में से नित नए नए मत मतांतर, बाबा-गुरु-ढोंगी-व्याभिचारी आदि निकलते रहते हैं और हिन्दू समाज खंडित होकर बँटाधार को ही प्राप्त होता जा रहा है ।
कारण ये है कि हिन्दू संगठनो, मठों आदि में विद्वानों की कमी और संगठनों की अज्ञानता को भाँपते हुए ही भारत में कार्यरत वामपंथी, मुस्मिल, ईसाई आदि राष्ट्रद्रोही संस्थाएँ षडयंत्रपूर्वक इन संगठनों में छद्मवेशधारी साधुओं-बाबाओं की घुसपैठ करवाती हैं जो दिखने में संत, महात्मा, सन्यासी या साधु जैसे लगते हैं परन्तु वैचारिक रूप से वामपंथी, सैक्युलर, मुस्लिम-ईसाई परस्त होते हैं । यदि इन संगठनों में कोई सदाचारी धार्मिक या दयालु मनुष्य कोई होता भी है तो उसे इन छद्मवेषधारीयों द्वारा संगठनों में किनारे कर दिया जाता है या षडयंत्र के द्वारा इनके चरित्र पर दाग लगवाकर मीडिया में घुसे हुए अपने टट्टुओं द्वारा बदनाम करवाकर इनकी छवी खराब करवाकर हिन्दू युवाओं में साधुओं सन्यासीयों के प्रति घृणा पैदा करवाकर नास्तिकता को प्रोत्साहन दिया जाता है । कई बार तो ऐसा भी होता है कि इन कुछेक सदाचारीयों को गायब तक करवा दिया जाता है या इनकी हत्या करवा दी जाती है ।
इसी कारण भारत में जितने भी हिन्दू समाज के आंदोलन हैं ये इसलिये समाप्त हो गए या आधे रास्ते से ही मोड़कर दिशाहीन कर दिये गए क्योंकि भारत में कार्यरत देशी और विदेशी राष्ट्रद्रोही शक्तियाँ १२५ करोड़ की जनसंख्या में अपना-अपना भविष्य खोज रही हैं । भारत में इस्लामी और ईसाई शक्तियाँ बौद्धों, खालिस्तानीयों, वामपंथीयों आदि को आगे करके हिन्दू समाज को समाप्त करके भारत को ईसाईस्तान या दारुल इस्लाम के रूप में बाँटकर राज्य स्थापित करने के लिये प्रयासरत हैं । अरब से तेल की कम होती उपयोगीता के कारण इस्लाम कमजोर हो रहा है इसलिये अरबी इस्लाम भारत के प्राकृतिक सम्पन्न संसाधनो को हथियाने के लिये भारतीय मुस्लिम संस्थाओं को प्रोत्साहित करके दारुल इस्लाम बनाने की फिराक में है, वहीं युरोप से समाप्त होती ईसाईयत और वैटिकन के कम होते प्रभाव के कारण भारत के दलित, आदिवासी वर्गों में अपना भविष्य बचाने का प्रयास कर रही है , वामपंथ की साम्यवादी विचारधारा दुनिया में विफल होती होती भारत और नेपाल में अपना वर्चस्व को टिकाने हेतु भारत में इस्लाम और ईसाईयत के पीछे छुपकर अपना एजंडा चलाने का प्रयास करती है ।
समस्याएँ देखने में कितनी ही भयंकर दिखती हों परन्तु इन्हें दूर करना कठिन हो सकता है पर असंभव नहीं । यदि भारत में हिन्दू समाज की पूर्ण सुरक्षा करनी हो तो संगठनों को महर्षि मनु के मापदंडों और मन्तव्यों के अनुसार सुदृढ़ करना होगा । गुरुकुलों, पाठशालाओं आदि में पठित विद्वानों की विद्याओं की अच्छी प्रकार परीक्षा करके ही धर्म सभा स्थापित करनी चाहिए । क्योंकि परीक्षा से ही विद्यावित् विद्वान और छद्मवेषधारी की परीक्षा हो सकती है । और ऐसा होने से कोई भी वामी, कामी आदि नकली साधु वेष धारण करके ऐसी धर्मसभा में घुसपैठ करने का दुस्साहस नहीं कर सकेगा और शीघ्र ही पकड़ा जायेगा ।
धार्मिक विद्वान मनुष्यों का संगठन इसलिये आवश्यक है क्योंकि :-
यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्ममतद्विदः ।
तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति ।।
( मनुस्मृति १२/६५ )
तमोगुण अर्थात् अविद्या से युक्त मूर्ख वेदोक्त धर्मज्ञान से शून्य जन जिस धर्म का उपदेश करते हैं वह धर्मरूप में कहा गया अधर्मरूप पाप सौ गुना होकर सैंकड़ों वक्ताओं को फैलकर लगता है ।
ऐसे ही विद्वान-विदुषियों की सभा कि स्थापना कर शारीरिक बल से युक्त शस्त्रधारीयों की क्षत्रिय सेना इस संगठन की रक्षा करे और वैश्यवर्ग के लोग इनका पोषण करें । ऐतिहासिक उदाहरण में :- मगध के शासन के विरुद्ध विद्रोह करने के उद्देश्य से आचार्य चाणक्य ने विद्वानों की ही सभा स्थापित कर चन्द्रगुप्त और अन्य युवाओं को सैन्य प्रशीक्षण दिलवाकर और धन की व्यवस्था वैश्य वर्ग वालों से करवाकर अखंड भारत के स्वप्न को सफल बनाया था ।
यदि ऐसी एक भी तीन से लेकर दश विद्वानों वाली धर्म परिषद् पूरे भारत में स्थापित हो जाए तो हिन्दू समाज कभी दुर्दशा को प्राप्त न होगा । क्योंकि ऐसे ही विद्वान निर्णय लेने में सक्षम, सत्यवक्ता, दृढ़ संकल्पित होने के कारण पूरे हिन्दू समाज को सही दिशा देकर भारत को पुनः सत्य सनातन वैदिक काल में ले जा सकते हैं ।

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