Sunday, March 11, 2018

डॉ चंद्रकांत राजू अकेले ही गणित के स्वाधीनता की लड़ाई लड़ने वाले योद्धा

  



- चर्च से अकेले दम भिड़ता योद्धा गणितज्ञ
 वह तो हम सभी ने पढ़ा होगा, परंतु क्या कभी गणित को औपनिवेशिक मानसिकता से स्वाधीनता दिलाने की लड़ाई भी हमने लड़ी है? गणित को स्वाधीन कराने की लड़ाई? क्या हमें कभी यह ध्यान में भी आया है कि गणित जैसा विषय भी औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार हो सकता है?

जी हाँ, न केवल गणित और विज्ञान औपनिवेशिक मानसिकता के शिकार हैं, बल्कि एक योद्धा गणितज्ञ गणित और विज्ञान को औपनिवेशिकता से मुक्त कराने की लड़ाई छेड़े हुए है. यह योद्धा पूरी दुनिया में घूम-घूम कर सभी महान और श्रेष्ठ माने जाने वाले गणितज्ञों को चुनौती दे रहा है। ये योद्धा गणितज्ञ हैं डॉ. चंद्रकांत राजू। धर्म... विशेषकर ईसाइयत और विज्ञान में संघर्ष की बात अक्सर की जाती है, परंतु क्या कोई भी यह सोच सकता है कि ईसाइयत का विज्ञान और गणित के साथ कोई गठजोड़ भी है? क्या कोई सपने में भी सोच सकता है कि विज्ञान और गणित हमें ईसाइयत की शिक्षा देते हों? राजू ने इसी गंठजोड़ के खिलाफ युद्ध छेड़ रखा है। वे न केवल इस गंठजोड़ को उजागर करते हैं, बल्कि उसे समाप्त करने के लिए भी प्रयत्नशील हैं।

डॉ. राजू एक महान गणितज्ञ तो हैं ही, वे एक महान भौतिकिविद् भी हैं और महान दार्शनिक भी। वास्तव में केवल गणितज्ञ होने से वे इन पहेलियों को शायद न तो समझ पाते और न ही सुलझा पाते। एक भौतिकिविद् और दार्शनिक होने के कारण वे वर्तमान गणित और विज्ञान में घुसाए गए “ईसाई दर्शन” को देख और समझ पाते हैं। काल, यानी कि समय के दर्शन को लेकर उनकी समझ एकदम स्पष्ट और भारतीय दर्शन के अनुकूल है। उन्होंने आईंस्टीन की श्रेणी के विज्ञानी माने जाने वाले स्टीफन हॉकिंग्स द्वारा दी गई काल की व्याख्या को खारिज करते हुए पुस्तक लिखी है, “द इलेवन पिक्चर्स ऑफ टाइम”. गणित के दर्शन में जो गड़बड़ी हुई है, उसे उजागर करने के लिए उन्होंने केवल गणित का इतिहास नहीं लिखा, उन्होंने कल्चरल फाउंडेशन ऑफ मैथेमेटिक्स (गणित का सांस्कृतिक स्थापनाएं) लिखी। यह पुस्तक केवल गणित का इतिहास नहीं बताती, उसके दर्शन को भी स्पष्ट करती है। इस कारण वे गणित के दर्शन में की गई गड़बड़ी की ओर भी संकेत करते हैं। अभी तक गणित के इतिहास पर लिखी गई पुस्तकों में यह एक अपने प्रकार की अकेली पुस्तक है।

डॉ. राजू बताते हैं कि कैल्कुलस का प्रयोग भारत में पहले हुआ था। भारत से ही यह पद्धति यूरोप पहुँची। वहाँ न्यूटन को यह समझ नहीं आई। इस पर जो उसे समझ नहीं आया, वहाँ अपनी बुद्धि से कुछ परिवर्तन किए। उन परिवर्तनों के साथ न्यूटन का कैल्कुलस अंग्रेजी राज में भारत आया। आज वही कैल्कुलस हम पढ़ते हैं। डॉ. राजू ने यह साबित किया है कि बड़े से बड़े गणितज्ञ को भी यह कैल्कुलस समझ में नहीं आता, और वे केवल इसे रट जाते हैं। देश-विदेश के मूर्धन्य महाविद्यालयों में उन्होंने गणित के विद्यार्थियों के बीच उन्होंने इसे स्थापित किया है कि कैल्कुलस को उन्हें रटना ही पड़ता है। वे यह भी बताते हैं कि रॉकेट प्रक्षेपण से लेकर कम्प्यूटर-विज्ञान तक जितनी भी आधुनिक तकनीकें हैं, उनमें इसका उपयोग नहीं होता। वहाँ गणना के लिए एक साधारण से गणित का प्रयोग होता है, जो कि वास्तव में आर्यभट द्वारा विकसित कैल्कुलस में दिया हुआ है।

डॉ. राजू की यह संघर्ष यात्रा बचपन से ही प्रारंभ हो गई थी। ग्वालियर में जन्मे राजू जब उच्च माध्यमिक विद्यालय में पढ़ा रहे थे, तभी विज्ञान को लेकर उनके मन में प्रश्न घुमडऩे लगे थे और उनका विज्ञान के शिक्षकों से टकराव भी प्रारंभ हो गया था। वे बताते हैं, ‘एक बार मेरे शिक्षक Inclined Plane यानी झुकी हुई सतह के बारे में एक प्रयोग के बारे में पढ़ा रहे थे। उसमें उन्होंने बताया कि “म्यू” जो कि फ्रिक्शन का को-इफिशिएंट है वह tan थीटा के बराबर होता है। इसे करवाते समय उन्होंने बताया कि भारी चीज जल्दी गिर जाएगी और हल्की चीज देर से गिरेगी इसलिए सतह को और अधिक झुकाना पड़ेगा। मैंने पूछा कि यदि म्यू नहीं बदल रहा है, तो थीटा कैसे बदलेगा? इस पर बच्चे हंस पड़े और शिक्षक ने स्वयं को अपमानित महसूस किया। उन्होंने बाद में मुझे कहा कि मैं एक पुस्तक का नाम और उसका पृष्ठ संख्या भी बता दूंगा, उसमें ऐसा लिखा हुआ है। मेरा कहना था कि हम विज्ञान पढ़ रहे हैं, सच्चाई की खोज कर रहे हैं, इसलिए पुस्तक में लिखा है, फिर भी वह गलत हो सकता है। इस पर वह शिक्षक मुझसे बहुत नाराज हो गए।’ राजू बताते हैं कि इसका उन्हें खामियाजा भी भुगतना पड़ा। उस शिक्षक ने बाद में उन्हें प्रायोगिक परीक्षा में अंत:परीक्षा में शून्य दे दिया। हालांकि प्रायोगिक परीक्षा के परीक्षक ने उन्हें बाह्यपरीक्षा में 45 में से 44 अंक दिए और इस प्रकार राजू उत्तीर्ण हो गए हालांकि इससे उनका कक्षा में स्थान थोड़ा नीचे हो गया।

राजू के लिए विज्ञान के अधिनायकवाद का यह पहला अनुभव था। वे कहते हैं, ‘मुझे महसूस हुआ कि विज्ञान केवल सच की खोज के लिए नहीं है, यह अधिकार की बात है। मुझे यह भी लगा कि विज्ञान के विषय में शिक्षक विद्यार्थी को प्रायोगिक परीक्षा में परेशान कर सकते हैं। ऐसा ही अनुभव मुझे महाविद्यालय में स्नातक की पढ़ाई में आया। मैं मुम्बई विश्वविद्यालय से स्नातक कर रहा था। मैं स्टूडेंट काउंसिल में भी था। कई बार कक्षा से जल्दी भी चला जाता था। डिमॉन्सट्रेटर मुझे कुछ कहता नहीं था और उसे अन्य विद्यार्थी उलाहना दिया करते थे। उस बार भी प्रायोगिक परीक्षा में उन्होंने काफी कम अंक दिए जिससे मैं लिखित परीक्षा में तो सर्वोच्च स्थान पर आया, परंतु प्रायोगिक परीक्षा में काफी कम अंक आए।’ राजू इन घटनाओं के कारण विज्ञान की पढ़ाई से निराश हो गए। उनकी रूचि गणित में पहले से भी थी ही, इसलिए उन्होंने विज्ञान छोड़ कर गणित की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। वे बताते हैं कि विश्वविद्यालय में गणित के एक शिक्षक थे एमएस हुजुरबाजार। वे एब्सट्रैक्ट एल्जेब्रा (Abstract Aljebra) पढ़ाते थे जिसमें उन्हें काफी रूचि जग गई थी। वे मुम्बई की लोकल ट्रेनों में यात्रा करते हुए भी इसके प्रश्न हल करते रहते थे। उसी समय उन्होंने लॉजिक एवं इलेक्ट्रानिक सर्किट देख कर कम्प्यूटर भी बनाया। उस समय कम्प्यूटर काफी अनोखी चीज थी, लोगों को समझ नहीं आता था कि यह कैसे बनता है। मेरे उन प्रयोगों को देख कर एक सज्जन ने मुझे कहा कि पढ़ाई-वढ़ाई छोड़ो और मेरे साथ आकर काम करो। उन्हें मेरे प्रयोग काफी पसंद आए थे।
राजू बताते हैं कि बचपन से ही उनकी रूचि भौतिकी में भी काफी अधिक थी। इसीलिए उन्होंने आईआईटी में प्रवेश नहीं लिया जहाँ कि उनके एक भाई पहले से ही पढ़ रहे थे। उनकी माँ चाहती थीं कि दोनो ही भाई वहाँ पढ़ें। परंतु उनकी रूचि वहाँ नहीं थी। इस प्रकार राजू प्योर मैथेमेटिक्स यानी विशुद्ध गणित की ओर बढ़ गए। गणित में राजू की रूचि इतनी थी कि उन्होंने पाठ्यक्रम को कक्षा से पहले ही पूरा पढ़ रखा था। इसलिए वे अक्सर कक्षा में जाते ही नहीं थे। उस अनुभव को याद करते हुए वे बताते हैं, ‘पहले से सबकुछ पढ़ा होने के कारण मैं कक्षा में बोर होता था। हमारे एक शिक्षक थे एसएस शिखंडे। वे काफी सज्जन व्यक्ति थे। वे मुझे इसके लिए टोकते थे। हालांकि कक्षाओं में रहना हमारे लिए अनिवार्य नहीं था, केवल यूजीसी द्वारा दी जाने वाली राष्ट्रीय छात्रवृत्ति प्राप्त छात्रों के लिए यह आवश्यक था। उसके बिना छात्रवृत्ति नहीं मिलती और मुझे छात्रवृत्ति चाहिए थी।’ हालांकि परीक्षाओं में राजू को काफी अच्छे अंक आते रहे, परंतु वहाँ भी उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

एसएस शिखंडे के कहने पर राजू टाटा इंस्टीट्यूट में भी गए, परंतु वहाँ जिस प्रकार से गणित पढ़ाई जाती थी, वह उन्हें पसंद नहीं आया। इसके बाद वे फिर से विज्ञान की ओर मुड़े। उन्होंने पता किया कि गणितीय भौतिकी के एक विद्वान आईआईटी दिल्ली में हैं के आर पार्थसारथी। राजू दिल्ली आए। राजू उनसे मिले कि क्या वे उन्हें पीएचडी छात्र के रूप में राजू को स्वीकार करेंगे। पहली ही भेंट में पार्थसारथी ने राजू से पूछा कि क्या वे स्पेक्ट्रम मल्टीप्लिसिटी थ्योरम को प्रमाणित कर सकते हैं। राजू बताते हैं, ‘स्पेक्ट्रम मल्टीप्लिसिटी थ्योरम को स्थापित करने के लिए एक पूरी किताब है। ऐसे ही उसे स्थापित करना कठिन है। फिर भी मैं जब परीक्षा में बैठा तो मैं इसके लिए पूरी तरह तैयार था। यदि यह प्रश्न पूछा जाता तो मैं 4-5 घंटे में उसे वहीं पर हल कर देता। परंतु आईआईटी के शिक्षक मेरे उत्तरों से नि:शब्द हो जा रहे थे।’ मैं उस परीक्षा में सर्वोच्च स्थान पर था।

राजू पीएचडी के लिए दिल्ली आए, परंतु उनका रास्ता सरल नहीं था। आते ही उन्हें पार्थसारथी ने बताया कि वे आईआईटी दिल्ली छोड़ रहे हैं। राजू बहुत हैरान हुए। वे उनसे पहले मिल चुके थे। राजू अपनी यूजीसी की छात्रवृत्ति छोड़ कर यहाँ आए थे। परंतु पार्थसारथी ने उन्हें साफ कह दिया कि वे अपने बाकी छात्रों को तो अपने साथ आईएसआई भारतीय सांख्यिकी संस्थान, दिल्ली में ले जाएंगे. उन्हें चूंकि वे ठीक से जानते नहीं, इसलिए राजू को उसकी प्रवेश परीक्षा देनी होगी। इस प्रकार डॉ. राजू ने पहले आईआईटी की परीक्षा दी और उसमें सर्वोच्च रहने के तुरंत बाद उन्हें आईएसआई की परीक्षा में बैठना पड़ा। उस परीक्षा में राजू ने केवल कठिन सवालों को हल किया, आसान सवालों को छोड़ दिया। राजू बताते हैं, ‘वह परीक्षा मैंने 44 डिग्री की तेज गर्मी में दिया था। मुझे लगा कि इतनी गर्मी में मैं इन आसान सवालों को हल करने में समय नहीं लगा सकता।’ हालांकि आईएसआई की परीक्षा में यह देखा जाता है कि परीक्षार्थी कैसे प्रश्नों को हल करने का प्रयास करता है। इसलिए राजू का चयन वहाँ भी हो गया।
आईएसआई में भी राजू को समस्याओं का सामना करना पड़ा। वहाँ उन्हें जिस विषय पर काम करने के लिए दिया गया, उस विषय पर पार्थसारथी के एक पुराने छात्र राजेंद्र भाटिया पहले ही काम कर रहे थे। एक ही विषय दो छात्रों को दिए जाने के अलावा राजू को एक समस्या यह भी लगी कि उस विषय को पहले से ही हल किया जा चुका था। फिर भी राजू ने उस विषय पर तीन व्याख्यान दिए। वह जब उन लोगों को समझ नहीं आया। उन्हें उस पर नोट लिख कर देने के लिए कहा गया। राजू ने नोट लिखकर दिया तो उसे खारिज कर दिया गया और फिर से लिखने के लिए कहा गया। कुछ दिनों बाद राजू को पता चला कि किसी ने उनके नोटों को ही अपनी थ्योरी के रूप में प्रकाशित करवा दिया था। उन्हें यह बुरा लगा कि कम से कम उन्हें यह बताया जाना चाहिए था।

इसके बाद पार्थसारथी ने उन्हें गाइड करने से मना कर दिया। राजू को नोटिस दे दिया गया कि नया गाइड ढूंढे या फिर इंस्टीट्यूट छोड़ कर चले जाएं। राजू बताते हैं कि आईएसआई में छात्र कम ही टिकते थे। एक महीने में छात्र तंग हो कर भाग जाया करते थे। ऐसे में राजू संकट में आ गए। उन्होंने अपनी थिसीस को कई लोगों को भेजा। इस पर अंतरराष्ट्रीय भौतिकीविद् पी ए एम डिरैक, आईआईटी के सी एस मेहता, दिल्ली विश्वविद्यालय के ए एन मित्रा, पॉल डेविस आदि की सकारात्मक टिप्पणियां आ गईं। इन टिप्पणियों के कारण आईएसआई ने राजू को नहीं निकाला। राजू बिना गाइड के ही काम करते रहे। उन्होंने अपनी थिसिस जमा की। उन्होंने जयंत नार्लीकर के एबजार्वर थ्योरी ऑफ रेडिएशन के खंडन में उन्होंने अपनी थिसिस लिख कर जमा की। उसे लौटा दिया गया कि इसमे स्टैटिस्टिक्स नहीं है। फिर राजू ने इस तरह के अनेक उदाहरणों को सामने रखते हुए अपनी थिसिस की सिनोपसिस नए प्रारूप में लिख कर जमा की। संस्थान के शिक्षक इस पर बहुत हैरान हुए और आईएसआई ने उन्हें एक गाइड दे दिया और उन्हें कोलकाता भेज दिया। आखिर पीएचडी की थिसिस को केवल तीन महीनों में फिर से लिख देना कोई छोटी-मोटी बात नहीं थी। उसी बीच उनकी पत्नी को भी आईआईएम अहमदाबाद में एक काम मिल गया था, इसलिए राजू ने भी दिल्ली छोड़ दिया।
वर्ष 1990 में राजू ने कोलकाता में ही पीएचडी पूरी की। परंतु उनकी पीएचडी को स्वीकृत करने में संस्थान ने पूरे तीन साल लगा दिए। दूसरी ओर उनके ही लेक्चर-नोट के आधार पर काम करने वाले राजेंद्र भाटिया को युवा विज्ञान

3 comments:

  1. बहुत बहुत आभार इस जानकारी के लिये ।

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  2. प्रणाम!
    लेख अधूरा है। भाटिया का क्या हुआ?
    अप्रति

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  3. This comment has been removed by a blog administrator.

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