Wednesday, February 21, 2018

सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया का सार :६
( सनातन राजनैतिक दल की आवश्यकता लेखमाला  का अंग )
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४९. १८५७ का संग्राम वस्तुतः भारत के राजाओं के दो समूहों का आपसी संग्राम था जिसमे एक पक्ष ने अंग्रेजों का साथ लिया और दिया . ध्यान रहे लिया भी ,केवल दिया नहीं .(थोड़ी भी स्वतंत्र बुद्धि हो तो राजस्थान के राजाओं को विक्तोरिया से हाथ मिलाते चित्र देख लो जो संग्रहालयों में हैं :२ बराबरी के राजाओं का मिलन दिखेगा .)
५०   १८५८ से भारत के  लगभग आधे भाग पर अंग्रेज भारतीयों की साझेदारी में अर्ध भोक्ता शासक हो गए . ( २० वीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजों द्वारा छपे मानचित्र सार्वजानिक हैं ,उन्हें देखिये .उनमे ब्रिटिश क्षेत्र और देसी राजाओं के क्षेत्र अलग अलग है :स्वतंत्र क्षेत्र हैं :जम्मू ,लद्दाख ,कश्मीर घाटी ,आधा पंजाब और आधा हरयाना जिनमे कई राज्य थे ,सिन्धु, अफगानिस्तान ,गजनी और गोर (कई मूर्ख इन्हें विदेश मानते हैं ,ये भारत की रियासते हैं ),बलूचिस्तान ,पख्तूनिस्तान ,,चंबा ,थानेश्वर, कुल्लू ,काँगड़ा, कुमायूं ,कन्नौज ,अवध, इलाहाबाद, काशी , जौनपुर, रामपुर, रोहिल्खंड ,मीरजा पुर (यानी  लक्ष्मी मैया का निवास ,मूर्खों का कल्पित किसी मिर्ज़ा का पुर नहीं ), मथुरा ,मेरठ,मेव , असम , कूचबिहार ,नागालैंड, मेघालय,मणिपुर, त्रिपुरा, बंगाल, बिहार का बड़ा हिस्सा ,ओड़िसा ,छतीसगढ़ ,बस्तर ,भोपाल ,बुंदेलखंड,गोंडवाना, ग्वालियर,इन्दोर,रीवा  पन्ना ,सीधी ,सिंगरौली , छतरपुर ,,झाँसी, मालवा,भरतपुर, धौलपुर,नौगाँव , बांस बाड़ा ,सिरोही ,हमीरपुर ,डूंगरपुर , करोली ,किशनगढ़ ,कुशलगढ़, पालनपुर, प्रतापगढ़ ,शाहपुरा ,टोंक ,कालिंजर, अलवर ,जयपुर ,अजमेर ,जोधपुर , आमेर ,मारवाड़ ,जैसलमेर, बीकानेर, उदयपुर ,मवाद, चित्तोड़ ,कोटा ,बूंदी ,गुजरात वके २० प्रमुख राज्य ,महाराष्ट्र के १५ प्रमुख राज्य ,बरार ,हैदरबाद,विजयनगर ,मैसूर ,कर्णाटक की कई रियासतें ,आंध्र की कई रियासतें ,तमिलनाडु के कई राज्य , तंजावर ,कोछें , ट्रावन्कोर  आदि आदि ..
जो लोग इन्हें भी ब्रिटिश क्षेत्र मानते हैं और अंग्रेजों के गुलाम बताते हैं ,उन ;लार उचित शासन आने पर देश द्रोह का मुकदमा चल सकता है क्योंकि वे स्वतंत्र राज्यों को जबरन गुलाम बताते हैं और अंग्रेजों की अयाचित भक्ति में डूबे हैं
जो राज्य १९४७ तक स्वाधीन थे ,उनके स्वाभिमानी लोग इन  झूठे इतिहासकारों की क्या गत बनायेंगे समय मिलने पर ,यह सोच लीजिये.
अगर ये ब्रिटिश क्षेत्र थे तो अंग्रेजी सत्ता का हस्तांतरण पाने के बाद कांग्रेस शासकों को इनसे संधियाँ क्यों करनी पड़ीं ५२५ राजाओं से संधियाँ की गयीं .

(क्रमशः ७ पर जारी )

सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया
( सनातन राजनैतिक दल की आवश्यकता  लेखमाला का अंग )
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५१   1858 के बाद कई भारतीयों को पटाकर अंग्रेज शासक वर्ग चलने लगा .
५२ पहले के राममोहन रे (कहाँ के राजा ,कहाँ के जोगी,कंपनी के नौकर )आदि ने सेवा कर पृष्ठ भूमि बना ही दी थी .सब कुछ्प्रेम और कपट चाल साथ साथ चल रहा था
५३ . देशी राज्य भारतीय परंपरा के प्रभाव से नए ज्ञान के प्रति खुले थे  christians की तरह बंधे नहीं थे और नए अंग्रेजों का बड़ा हिस्सा घोर चर्च विरोधी था ,यूरोप में रूसो ,डार्विन ,वाल्टेयर , बर्नार्ड शॉ अदि चर्च के प्रचंड  विरोधी  थे ही . इसलिए नए ज्ञान के प्रति भारतीयों में सहज प्रेम था .
५४ शांति से शासन के इच्छुक अंग्रेजों के साथ भारत के अभिजन भी शांति पूर्ण  दांव पेंच चल रहे थे . सबसे प्रबुद्ध भारत के धर्मनिष्ठ ब्राह्मण रहे हैं .उनके नेतृत्व में गौ रक्षिणी सभाएं ,धर्म महामंडल आदि चले जिन्हें खुफिया विभाग में ठगी और डकैती शाखा के अंतर्गत दुष्ट अंग्रेज अंकित कर रहे था और सामने भय से मीठा बोलते थे . गुरुकुल में  उनके गोपनीय दस्तावेजों के  कई साहित्य उपलब्ध  हैं जहाँ वे  दस्तावेज दर्शाते  हैं कि शांत दिख रही नई क्रियाएं कभी भी हमारा शासन उखाड फेंक सकती है और हम शांत ज्वाला मुखी  पर बैठे हैं. यह १८८० से १९९१० तक  की लागातर रिपोर्ट हैं जिनमे  स्वामी दयाम्नंद जी जैसों को भी डकैती विभाग की फाइल में ही दर्ज किया गया है ,ऐसे कमीने और दोगले ये थे ,कई कांग्रेस नेताओं ने इनसे ही यह सब सीखा
५४ इन पंडितों से अंग्रेज इतने आतंकित थे कि जब २० वीं शताब्दी में दिल्ली दरबार लगा तो सनातनधर्म के महापंडित दींन  दयालु .शर्मा  जी को सादर बुलाया गया जिसमे प्रश्न यह उठा कि पंडित जी तो रानी और प्रिंस के सम्मान में खड़े  नहीं हो सकते क्योंकि वे महान पूज्य हैं और सम्राट का उठकर मिलना भी प्रजा में सही सन्देश नहीं देगा तो दो  कैंप एक ही मैदान के दो छोर पर लगे और तय समय पर दोनों तरफ से दोनों (इधर से पंडित जी ओर  उधर से प्रिंस और महारानी ) निकलकर  बीच में खड़े खड़े  मिले ,बातें की  और दोनों वापस लौट गए अपने अपने शिविर में .
५५ उधर युवक युवतियों के समूह प्रचंड देशभक्ति से भरकर आततायी अजनबी बाहरी घुसपैठियों के रूप में आये अंग्रेजों को मर मार कर  भगाने  लगे ,स्वयं लंदन में घुसकर आततायियों को मारा .अंग्रज डर से कांपने लगे और प्रतिशोध से जल उठे .
५६ लोकमान्य तिलक , विपिनचंद्र पाल ,लाला लाजपतराय का   नेतृत्व पा कर  ठंडी राजनीति के लिए रचित कांग्रस दहकने लगी .भारताग्नि  प्रदीप्त हो उठी .
५७ अंगेज अति सक्रिय हो गए . चुनिन्दा अंग्रेज स्त्रियों को कतिपय भारतीय युवकों से प्रेम की प्रेरणा दी और  उन पति पत्नी और कतिपय मुसलमानों को पटाकर ताशकंद में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करायी .
५८ फिर और तलाश में लगे रहे ,नेहरु को पहले तवज्जो नहीं दी  पर गाँधी जी बड़े काम के और मेधावी लगे तो उन पर खूब  मेहनत  की
.
५९ गांधीजी चतुर और अति महत्वावाकांक्षी थे सो उन्होंने भी अंग्रेजो से चतुराई भरे ही सम्बन्ध बनाये ,वे किसी के एजेंट हो ही नहीं सकते थे ,स्वयं अपने ही एजेंट वे थे .
६० गांधीजी ने अफ्रीका में अंग्रेजो से अति मधुर सम्बन्ध बनाये और उनसे सहयोग लेने लन्दन गए . १९०६से १९०७ में . वहां संधि हुयी ,अंग्रेज गांधीजी को वजन देंगे ,गांधीजी क्रांतिकारियों से अंग्रेजों की रक्षा के लिए जो संभव होगा ,करेंगे ,इसी संधि में से "हिन्द स्वराज "नामक  बुकलेट  रची गयी ,जैसा  प्रख्यात विदुषी केडिया जी ने लिखा है : : गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका में हैं  जहाँ भारतीय क्रन्तिकारी हैं ही नहीं  और हिन्द स्वराज का प्रारंभ क्रांतिकारियों को भटके भूले बताने से होता है ,यह एक मंजे हुए और महत्वाकांक्षी ३६ वर्षीय युवक का दांव है जो अंग्रेजों से संधि कर  लन्दन से उस समय लौटा है जब मदन लाल धींगरा और ऊधमसिंह जैसे सिंह शावकों से लन्दन दहल रहा है.

आगे है भारतीय  वीरता  से  छल की कहानी और सत्ता हस्तांतरण की मीठी चा लें   जिन में नेहरु अंततः गाँधी को छल कर सत्ता के शीर्ष पर जाकर हिन्दू धर्मं के सुनियोजित विनाश के लिए अल्प संख्यकों और  communists से साठगाँठ  करते हैं और फिर उनकी ही राजनीति समकालीन भारत का चालू मॉडल बन  जाती है .
✍  साभार रामेश्वर संकलन अजय कर्मयोगी

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